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रविवार, 16 दिसंबर 2012

कैथल की सरज़मीन का एक सिलसिला



                  उजाला इसकदर बेनूर क्यों है   
           किताबें ज़िन्दगी से दूर क्यों हैं

ये कहना है उर्दू के अज़ीम शायर जनाब फरहत शहजाद का. फरहत साहब जो समकालीन उर्दू शायरी का एक ऐसा नाम है जिसकी शायरी को भारतीय उपमहाद्वीप के सभी फनकारों ने अपनी आवाज़ दी है. इनकी पहली ग़ज़ल मेहंदी हसन साहब ने गाई और उनकी ही गज़ल मेहंदी साहब की आखिरी ग़ज़ल बनी. यही फरहत साहब अपनी जड़ों को तलाशते कल कैथल में थे. इनके वालिद तकसीम के समय पाकिस्तान के डेरा गाजी खान चले गए थे जहां फरहत साहब का जन्म हुआ.
     फरहत साहब यूं तो पिछले 35 सालों से अमरीका में हैं, लेकिन उनकी रूह यहीं गंगा-सतलुज और सिन्धु के मैदानों में मंडराती रहती है. साल के पांच-छह महीने वे यहीं गुजारते हैं. अपने पुरखों की सरज़मीन को देखने, उसे सिजदा करने, उसे छूने और महसूस करने की चाह उन्हें कैथल ले आयी और कल वे अपने अज़ीज़ दोस्तों जनाब दिनेश यादव और तरुण वर्मा के साथ अपने वालिद और अपनी अम्मी के घर गए . वक़्त ने हांलाकि मंज़र बदल दिया है, हवेली के आसपास बाज़ार उग आया है, फिर भी फरहत साहब को वहा की गलियों, वहाँ की हवा, पेड़ों, घरों, इधर-उधर डोलते पिल्लों और यहाँ तक की नालियों को देख कर महसूस हुआ जैसे वो अपने घर, अपने अब्बा के घर आये हैं ....अपनी अम्मी के घर.........आये हैं .....
   वे उस मस्जिद में भी गए जहां कभी उनके अब्बा जाया करते थे. आसपास के बाशिंदों से बात कर जैसे उनकी रूह को सुकून सा मिला.
   शाम को शहर के बाशिंदों ने उनका इस्तकबाल किया. कोयल काम्प्लेक्स में तकसीम(विभाजन) के समय उजड़ कर कैथल आये लोग उनकी एक झलक लेना चाहते थे....प्राध्यापक, दुकानदार, सरकारी मुलाजिम भी जिनके परिवार उधर से आये थे और जिन्हें अपने ज़मीन की खुशबू लेकर आये फरहत साहब को सिजदा करना था, वहां मौजूद थे.
       आये हुए लोगों की मुहब्बत फरहत साहब की आँखों को नम कर गयी. उन्होंने कहा की इतिहास में जो कुछ घट चूका है उसे हम बदल नहीं सकते....लेकिन हम आने वाले समय को बेहतर बना सकते हैं. दोनों मुल्कों का माजी (अतीत) एक रहा है, दोनों की आबो-हवा एक है, तहजीब एक है.....और लोग एक हैं जो अमन और शान्ति चाहते हैं. उन्होंने कहा की कुछ ही लोग हैं जो बुरा चाहते हैं, बाकी अवाम तो हमेशा बेहतरी चाहती है. हमें अवाम पर भरोसा करना चाहिए. दोनों मुल्कों के अमनपरस्त साहित्यकारों,  फिल्मकारों, फनकारों और पढ़े-लिखे लोगों की सांझी कोशिश से ही मुहब्बत को कायम रखा जा सकता है.
    
       कार्यक्रम के दौरान गंगा-जमुनी संस्कृति की बेहतरीन मिसाल देखने को मिली. मुल्तान से आकर बसे अजीम शायर राणा प्रताव गंनौरी साहब ने मुल्तानी में नज्में पढ़ीं. वो अभी भी अपनी माँ-बोली को जिंदा रखे हुए हैं. तो दूसरी तरफ फरहत साहब ने भी ठेठ हरियाणवी में किस्से सुनाये. यहाँ डेरा गाजी खान के दो बेटे भी पहली बार आपस में मिले, एक फरहत साहब तो दूसरे कैथल के जानेमाने साहित्यकार डा. अमृत लाल मदान. मदान साहब और उनकी पत्नी का परिवार विभाजन के समय डेरा गाजी खान से यहाँ आकर बसा था.
    फरहत साहब ने बताया की उनकी पत्नी हिन्दुस्तान से हैं. और वे जल्दी ही देवनागरी पढ़ना और लिखना सीखने जा रहें हैं ताकि वे हिंदी रचनाकारों को भी पढ़ सकें. फरहत साहब न जाने कितनों की ख्वाहिशें बन कर यहाँ आये थे. उनके मार्फ़त न जाने कितने लोगों ने अपनी ज़मीन को सिजदा किया. न जाने वे कितनों के दिलों में अपनी ज़मीन को बस एक बार देखने की ख्वाहिशें जगा गए. उनके अब्बा ने उनसे कहा था, फरहत, मुझे हज पर भले ही न ले जाना, पर एक बार कैथल ज़रूर दिखा देना. अब्बा की ख्वाहिश तो सियासी दांव-पेंचों मे उलझ कर रह गयीं पर फरहत साहब को ज़रूर सुकून मिला होगा. और हम सब उन्हें देख कर कृतार्थ हुए.......


         

बुधवार, 19 सितंबर 2012

हाल हाळी का

कात्तिक बदी अमावस थी और दिन था खास दीवाळी का 
-आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

कितै बणैं थी खीर, कितै हलवे की खुशबू ऊठ रही 
-हाळी की बहू एक कूण मैं खड़ी बाजरा कूट रही ।

हाळी नै ली खाट बिछा, वा पैत्याँ कानी तैं टूट रही
-भर कै हुक्का बैठ गया वो, चिलम तळे तैं फूट रही ॥

चाकी धोरै जर लाग्या डंडूक पड़्या एक फाहळी का
-आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

सारे पड़ौसी बाळकाँ खातिर खील-खेलणे ल्यावैं थे
-दो बाळक बैठे हाळी के उनकी ओड़ लखावैं थे ।

बची रात की जळी खीचड़ी घोळ सीत मैं खावैं थे
-मगन हुए दो कुत्ते बैठे साहमी कान हलावैं थे ॥

एक बखोरा तीन कटोरे, काम नहीं था थाळी का
-आंख्यां कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

दोनूँ बाळक खील-खेलणाँ का करकै विश्वास गये
-माँ धोरै बिल पेश करया, वे ले-कै पूरी आस गये ।

माँ बोली बाप के जी नै रोवो, जिसके जाए नास गए
-फिर माता की बाणी सुण वे झट बाबू कै पास गए ।

तुरत ऊठ-कै बाहर लिकड़ ग्या पति गौहाने आळी का
-आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

ऊठ उड़े तैं बणिये कै गया, बिन दामाँ सौदा ना थ्याया
-भूखी हालत देख जाट की, हुक्का तक बी ना प्याया !

देख चढी करड़ाई सिर पै, दुखिया का मन घबराया
-छोड गाम नै चल्या गया वो, फेर बाहवड़ कै ना आया ।

कहै नरसिंह थारा बाग उजड़-ग्या भेद चल्या ना माळी का ।
आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥


(साथी विक्रम प्रताप द्वारा प्रेषित दिल को छू लेने वाली हरियाणवी कविता)

सोमवार, 17 सितंबर 2012

एक बेबाक शायर : हाली पानीपती

हिन्दुस्तानी तहजीब की तरह हरियाणा की तहजीब और परम्परा भी हमेशा से बहुलतावादी रही है. लेकिन पिछले कुछ समय से तहजीब और संस्कृति को खास चश्मों से देखने की रवायत चल पड़ी है. तारीख भुलाई जाती रही है और गंगा -जमुना संस्कृति की तो बात करना भी वक्त जाया करना माना जाता है. ऐसे में “कैथलनामा” की बराबर यह कोशिश रहेगी कि हरियाणा और विशेषकर कैथल के सांझे इतिहास को याद किया जाए, उसे घर-घर पहुंचाया जाये और एक सांस्कृतिक आंदोलन की शरुआत की जाये . मीर, ग़ालिब , जौक उन्नीसवीं सदी के हिन्दोस्तान के चमकते शायर थे . उनमें एक शायर और भी था जिसका अंदाज़े बयान कुछ अलग ही था. अल्ताफ हुसैन हाली पानीपती , इनकी काबिलियत को ग़ालिब ने भी स्वीकारा और कहा , “हालांकि मैं किसी को शायरी करने की इजाज़त नहीं देता , लेकिन तुम्हारे बारे में मेरा कहना है कि तुम शेर नहीं कहोगे तो तो अपने दिल पर भारी अत्याचार करोगे.” अल्ताफ हुसैन हाली, पानीपत, हरियाणा के रहने वाले थे, और अपने ज़माने के तल्ख़ हालातों पर बेबाक शायरी करने की वजह से “हाली” कहलाये, जिसे बाद में उन्होंने अपना तखल्लुस बना लिया . हाली ने शराब और शबाब से इतर अपनी शायरी को अपने समय के कड़वे सच से नवाजा . उनका समय (1837--1914) हिन्दोस्तान के लिए बेतरह उथल-पुथल भरा समय था. एक तरफ बर्तानियाई हुकूमत , तो दूसरी तरफ हिंदू- मुसलमान में बांटा जाता आवाम. वे फटकारते हैं इस आवाम को –
 तुम अगर चाहते हो मुल्क की खैर
 न किसी हम वतन को समझो गैर
 हो मुसलमान उसमें या हिंदू
 बौद्ध मज़हब हो या के हो बरहमू
सबको मीठी निगाह से देखो समझो
आँखों की पुतलियाँ सबको
 अपने मुल्क के लिए बेपनाह मोहब्बत ही हाली को मुल्क की लगातार होती जा रही बर्बादी पर सोचने के लिए परेशान करती रही. वे सोचते रहे और लिखते रहे कि उसे और – और खूबसूरत कैसे बनाया जाए. वे धन के लालच में किसी सुलतान की खिदमत में अपनी मिट्टी छोड़ कहीं और जाने के बजाय अपनी मिट्टी में मिल जाने की ख्वाहिश रखते थे—
 तेरी एक मुश्ते ख़ाक के बदले
 लूं न हरगिज़ अगर बहिश्त मिले
 हाली ऐसे शायर नहीं थे कि जब दिल्ली और पूरा मुल्क 1857 की ग़दर में धधक रहा हो, वे हुस्न की शायरी करें. नहीं, बल्कि दिल्ली और आवाम की बर्बादी से वे हिल गए और उनकी कलम ने लिखा—
 तज़किरा देहली – ए—मरहूम का अय दोस्त न छेड़
 न सुना जाएगा हम से यह फसाना हर्गिज़
 मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो
 अय फलक इससे ज़्यादा न मिटाना हर्गिज़
 मेहनतकशों की मेहनत को सलाम करते हुए उनकी लूट पर वे जो लिखते हैं वह आज की ग्लोबल अर्थव्यवस्था में कामगारों की मेहनत की लूट पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है—
 नौकरी ठहरी है ले दे के अब औकात अपनी
 पेशा समझे थे जिसे, हो गई वो ज़ात अपनी
 अब न दिन अपना रहा और न रही रात अपनी
 जा पड़ी गैर के हाथों में हर एक बात अपनी
 हाथ अपने दिले आज़ाद से हम खो बैठे
 एक दौलत थी हमारी सो उसे खो बैठे
 अपने समय के दर्द को बेहद सरल और खूबसूरत ढंग पेश करने के साथ ही हाली पानीपती को सबसे ज़्यादा जिस बात के लिए सलाम किया जाना चाहिए वह है औरतों का मसला. यकीन नहीं होता कि आज से डेढ़ सौ साल पहले एक शायर इतनी संजीदगी से औरतों की ज़िंदगी को, उनके दर्द को, उनकी गुलामी को , देख और महसूस कर रहा था.
 ज़िंदा सदा जलती रहीं तुम मुर्दा ख्वाहिशों के साथ
 और चैन से आलम रहा ये सब तमाशे देखता
 ब्याहाँ तुम्हें या बाप ने ऐ बे ज़बानों इस तरह
 जैसे किसी तकसीर पर मुजरिम को देते हैं सज़ा
 ताज्जुब होता है कि इतने सालों पहले वे औरत - मर्द की बराबरी की बात करते हैं... .................
 शौहर हूँ उस में या पिदर ,या हूँ बिरादर या पिसर
 जब तक जियो तुम इल्मो दानिश से रहो महरूम यां
 आयी हो जैसी बे खबर वैसी ही जाओ बे खबर
 जो इल्म मर्दों के लिए समझा गया आबे हयात
 ठहरा तुम्हारे हक में वो ज़हरे हलाहिल सर बसर
 उन्होंने औरतों के प्रति ज़ुल्म और आखिरकार उनकी जीत का हौसला दिलाया. हाली ने हमेशा औरतों को सलाम किया और कहा---
 ऐ माओं , बहनों , बेटियों , दुनिया की जीनत तुमसे है
 मुल्कों की बस्ती हो तुम्हीं, कौमों की इज्ज़त तुमसे है
 तुम हो तो ग़ुरबत है वतन ,
तुम बिन है वीराना चमन हो देस या परदेस जीने की हलावत तुम से है
 मोनिस हो खाविन्दों की तुम , गम ख्वार फ़र जन्दों की तुम
 तुम बिन है घर वीरान सब , घर भर की बरकत तुम से है
 तुम आस हो बीमार की , उसरत में इशरत तुम से ............

. था पालना औलाद का मर्दों के बूते से सिवा
 आखिर ये ऐ दुखियारों ! खिदमत तुम्हारे सर पड़ी ...............

 अक्सर तुम्हारे कत्ल पर
 कौमों ने बांधी है कमर
 दें ताके तुम को यक क़लम,
 खुद लोहे हस्ती से मिटा गाड़ी गई तुम
 मुद्दतों मिट्टी में जीती जागती
 हामी तुम्हारा था मगर कोई नं जुज़ जाते खुदा

 ये तो कुछ आधी-अधूरी नज्में हैं.पूरी की पूरी यहाँ देना संभव नहीं है. हाली अपने समय के अफ़सानागार थे जिन्होंने शायरी में अपनी बात कही .समाज में मौजूद ऊंच – नीच , भेदभाव, कट्टरपन, अतार्किकता, सभी पर बेहद सरल भाषा में चोट की .महात्मा गांधी तक उनसे प्रभावित होकर उनसे कहते हैं, ”अगर हिन्दुस्तानी ज़ुबान का कोई नमूना पेश किया जा सकता है तो वो मौलाना हाली की नज़्म “मुनाजाते बेवा” का है .” हाली ने इतना कुछ लिखा कि उसे एक दिन में बयान कर देना गुस्ताखी होगी .आने वाले समय में हम कैथलनामा के मार्फ़त हाली पानीपती की और भी नज्में और उनकी ज़िंदगी से जुड़े वाक्यों से आपको रू-ब-रू कराते रहेंगे. उम्मीद है एक बेहद बड़े शायर पर बेहद मामूली सा हमारा यह प्रयास आपको पसंद आएगा और आप अपने सुझावों के द्वारा इसे बेहतर बनायेंगे. (आभार –डा.सुभाष चन्द्र एवं राम मोहन राय की पुस्तक “नवजागरण के अग्रदूत अल्ताफ हुसैन हाली पानीपती ,चुनिन्दा नज्मे और गजलें” के आधार पर )

शताब्दियों के गाए गीतों का अर्क है रागणी

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कितने कैथल ?

कैथल सिर्फ किसी एक भौगोलिक इकाई का नाम नहीं है. दुनिया में जगह-जगह कैथल हैं और हर कैथल में जगह-जगह अलग दुनिया है. हर कैथल की पीड़ा सांझी है. हर पीड़ा का कैथल साँझा है. सियासतें, घटनाएँ और तारीख लोगों को उजाड़ कर भले ही एक जगह से दूसरी जगह पर धकेल दें पर लोगों की यादों, तहजीब, खान-पान, रवायतों और बोलियों को क्या कभी वे बदल पाएं हैं? कागज पर नक्शा खींच कर सरहद के ‘इधर’ और ‘उधर’ पहुंचा दिए गए लोग जिस मिट्टी में पले-बढे हों और वहीं-कहीं तोतली जबान को बोलते हुए भाषा सीखी हो, जहाँ का गीत-संगीत, मुहावरे, गालियाँ और..और भी न जाने क्या-क्या अपने खून में रचाया बसाया हो उस मिट्टी की महक को भला कौन सियासत मिटा सकी है, मिटा पायेगी? सपनो, खुशियों और स्यापों के साये मजबूती से उनका दामन पकड़े साथ-साथ चलते हैं ताउम्र.... तकसीम के समय गहरी पीड़ा, आंसूओं और छलनी हो चुके दिलों के साथ लाखों लोग इधर से उधर या उधर से इधर भेज दिए गए लेकिन उनकी माँ बोली उनके साथ बनी रही. अपनी जुबान, तहजीब और अपनी मिट्टी की यादों को संजो कर रखने वाले लोग सरहद के दोनों ओर हैं. ऐसे ही लोगों से तहजीब बची रहती ओर बिखरती जाती है ओर आने वाली पीढियां उसे थामे रहती हैं. तकसीम के वक्त हरियाणा से पाकिस्तान गए लोंगो ने आज भी अपनी मा.बोली हरियाणवी को जिन्दा रखा है और इधर राणा प्रताप गन्नौरी जैसी शख्सियतों ने अपनी माँ-बोली मुलतानी में ढेरों नज्में लिख कर अपनी मिट्टी की महक को जिंदा रखा है. सांझी विरासत की ऐसी मिसालों से ही अमन की मशालें रोशन हैं. देखिये ये दोनों वीडियो...

सोमवार, 10 सितंबर 2012

खत प्रियतम के नाम

ख़त लिक्खा खुशखत के साथ, खैर, दुआ, चाहत के साथ । परदेसी प्रियतम के नाम लिखती हूं शिद्दत के साथ । कोई अच्छी खबर नहीं है तुम पढ़ना हिम्मत के साथ । माँ की हालत भी पतली है, बापू की हालत के साथ । देवर धुत्त पड़ा रहता है, जाएगा इस लत के साथ । डिग्री तो लाया है बड़का पढ़ लिख कर मेहनत के साथ । लेकिन अब मिलती हैं सबको नौकरियाँ रिश्वत के साथ । छुटका अब रहता है हरदम, आवारा दलपत के साथ । लाखों ऐब चले आते हैं, एक बुरी आदत के साथ । उसको तो खाना-पीना है, रोज़ बुरी संगत के साथ । मुनिया फस्ट रही बस्ती में, अट्ठासी प्रतिशत के साथ । सोचूं इसकी शादी कर दूँ, लड़का देख बखत के साथ । गली गली में खड़े लफंगे, देखें बदनीयत के साथ । कमला जैसे पगली हो गई, लगती हर हरकत के साथ । काली माँ का भूत था अन्दर, उतरा जो मन्नत के साथ । गंगाराम ने ब्याह दी बेटी, बूढ़े बदसूरत के साथ । रधिया कल कुएँ में कूदी लुटी हुई इज़्ज़त के साथ । बुधवा का सच कौन सुनेगा, हर मुखबर ताकत के साथ । आज इलैक्शन जीत गया फिर दुर्जन सिंह बहुमत के साथ । काले की बहु भाग गयी है, उस गोरे सम्पत के साथ । दयानन्द अब भी लड़ता है, मस्जिद के शौकत के साथ । हैं गठबन्धन की सरकारें, थोड़े से जनमत के साथ । अब तो बस ये क्रिकेट वाले, धन लूटें शौहरत के साथ । घर में मनीआर्डर नहीं आया, कब तक इस गुरबत के साथ । चंद दरारें दीवारों में, मुँह खोले हैं छत के साथ । घर की नीलामी का नोटिस आया है मुहलत के साथ । अब के फसल बहा गयी बारिश, कौन लड़े कुदरत के साथ । घर में लाख झमेले और मैं, लड़ती हर आफत के साथ । हाल पूछने कौन आएगा, सब रिश्ते दौलत के साथ । आवभगत भी न कर पायी, भाई का शरबत के साथ । कैसी हालत है मत पूछो, ज़िंदा हूँ ज़िल्लत के साथ । बिजली, दूध किराने का बिल, भेज रही हूँ खत के साथ । मैं तो मन्दिर में लड़ आई, पत्थर की मूरत के साथ । मर्द गया परदेस न जाने क्या बीती औरत के साथ । तुम मत लापरवाही करना अपनी इस सेहत के साथ । खर्च गुज़ारा कर ही लूंगी मैं ज्यादा बरकत के साथ । अब तो वापिस आ भी जाओ, रोटी है किस्मत के साथ । -गुलशन मदान* *गुलशन मदान कैथल के अत्यंत चर्चित कवि एवं गीतकार हैं

रविवार, 9 सितंबर 2012

कविताओं में कौंधती नाटक की अर्थछवियां

प्रो.अमृतलाल मदान - कैथल की जानी-मानी शख्सियत- कवि,नाटककार और इससे भी बढ़कर एक बेहद प्यारे इंसान. डा. मदान ने अपना पूरा जीवन साहित्य सृजन में लगाया है. वे सदैव साहित्य के नए अंकुरों को सींचते रहे हैं.  उनके संयोजन में होने वाली साहित्य सभा की मासिक गोष्ठियों ने  नए-नए रचनाकारों को साहित्यिक अभिव्यक्ति का मंच प्रदान किया है.  हाल ही में उनका नया कविता संग्रह 'बूँद-बूँद अहसास' आया था. प्रस्तुत है डा. सुभाष रस्तोगी द्वारा इस संग्रह की समीक्षा:

साहित्यकार अमृतलाल मदान कवि, कथाकार, उपन्यासकार और नाटककार के रूप में जाने-माने हैं। लेकिन उनके बारे में यह कहना काफी मुश्किल है कि वे मुख्यत: कवि हैं, कथाकार हैं अथवा नाटककार हैं। वैसे तो रचना कागज पर उतरने से पहले अपनी विधा का चुनाव स्वयं कर लेती है लेकिन फिर भी अमृतलाल मदान जैसा प्रत्येक रचनाकार जहाज के पंछी की तरह बार-बार अपनी मुख्य विधा में लौटता ही है। अमृतलाल मदान के सद्य: प्रकाशित कविता संग्रह ‘बूंद-बूंद अहसास’ जिसमें उनकी कुल 71 कविताएं संकलित हैं, की मार्फत यदि हम उनके रचनात्मक कर्म के परिदृश्य में झांकें तो मुख्यत: वे एक नाटककार के रूप में ही उभरकर सामने आते हैं क्योंकि उनकी कविताओं में बार-बार नाटक की अर्थछवियां कौंधती हैं। इन्हीं अर्थछवियों ने उनकी कविताओं को न केवल अद्भुत और अप्रतिम चित्रात्मकता प्रदान की है, बल्कि उनकी अर्थवत्ता को भी बढ़ा दिया है।
अमृतलाल मदान ने पटियाला के हार्ट इंस्टीच्यूट में मृत्यु शैया पर पड़े-पड़े खुद से वादा किया था कि यदि बच गया तो काव्य संग्रह छपवाकर पुनर्जन्म का उत्सव मनाऊंगा। यह काव्य संग्रह उनके खुद को ‘नायाब तोहफे’ के रूप में सामने आया है।
‘डा. अर्जुन-श्रीकृष्ण संवाद’, ‘कलंक’ और ‘मैं और मेरा साया’ संग्रह की कुछ ऐसी उल्लेखनीय कविताएं हैं जिनमें मदान का रंग-शिल्प अत्यंत मुखर हो उठा है तथा संग्रह की पहली कविता ‘डा. अर्जुन-श्रीकृष्ण संवाद’ अपनी बनावट और बुनावट में एक लघु काव्य नाटक का पूरा परिप्रेक्ष्य उपस्थित करती है। महाकाल की सत्ता के समक्ष मनुष्य की क्षण भंगुरता, लेकिन उसके अथक जीवट का रूपक रचती यह कविता मदान के रंग-शिल्प का एक आख्यान प्रतीत होती है।
‘चवन्नी बदनाम हुई’, ‘संकट रिश्तों की पार्किंग का’, ‘मेरे दो मित्र’, ‘तामस दूत’ तथा ‘बदलती हवाओं में’ कवि का केनवास अत्यंत व्यापक है, परंतु अपने कथन की वक्रता से मुख्यत: ये कविताएं जिस तरह से मानवीय रिश्तों में बाजार के दखल तथा बाजारीकरण के अभिशाप के कारण आदमी की बदलती फितरत के प्रति हमें चौकस करती हैं, वह कबिले गौर है -
‘दरअसल / बाजार का मुंह भी / सुरसा का मुंह है / हड़प जाता है उठ-उठकर / सभी चिल्लरों, छुट्टों, छुटभैयों को / पर चूमता है उड़-उड़ कर / समुद्र पार जाते / डालर-पौण्ड-येन / के भांडों, नक्कालों / बेसुरे नचैयों को।’ (पृ. 16)
‘हम रिफ्यूजी-एक’ व ‘हम रिफ्यूजी-दो’ पाठक की चेतना में इसलिए देर तक ठहरने वाली कविताएं हैं क्योंकि एक स्तर पर यह सवाल उठाती हैं कि विभाजन के संताप से दर-ब-दर हुए रिफ्यूजी न तो उग्रवादी बने, न चरमपंथी, न ही आतंकी, न आरक्षण मांगा और न ही धरने लगाये, लेकिन जो तीन-तीन पीढिय़ों से सुस्थापित हैं वे क्यों हथियार उठाते हैं? देखें ये पंक्तियां जो हमें अपने गिरेबान में झांकने का मौका देती हैं :
‘हम तो चलो विस्थापित सही, ‘रिफ्यूजी’ सही / पर जो पहले ही स्थापित हैं / वे क्यों हथियार उठाते हैं / आरक्षण मांगते हैं / रास्ते रोकते हैं / कैसी राजनीति खेलते हैं, चलाते हैं? / किसका शिकार बनते हैं? / किसको शिकार बनाते हैं?’ (पृ. 22)
इसी शृंखला की दूसरी कविता ‘हम रिफ्यूजी-दो’ संवेदना का एक दूसरा ही फलक उजागर करती है :
‘जब हुआ हमारा वतन निकाला / किसने मां की तरह संभाला / रक्षण किया बिना आरक्षण / किसने मुंह में दिया निवाला? / यह धरती थी हरियाणा की / सीधे सादे लोग लुगाई / ऐसा लगा ज्यों हम बिछुड़ों को / आकर मिले सहोदर भाई।’ (पृ. 114)
‘बिल्ली के बच्चे’, ‘बच्चो याद बहुत आते हो’, ‘आओ बच्चो घर आओ’ माता-पिता के अकेलेपन की अन्तव्र्यथा को उजागर करती हैं तो ‘रसोई को प्रणाम-एक’ तथा ‘रसोई को प्रणाम-दो’ जैसी कविताएं पाठक को घर की सोंधी महक के रू-ब-रू लाकर खड़ा कर देती हैं। ‘कौन थी वह’, ‘डायनासोर’, ‘दिल’, ‘रामजी के गांवों में’, ‘पहाड़ी बिजूका’, ‘सांझापन’, ‘पनीर और प्याज’, ‘सोचा था’ तथा ‘प्रेमी जोड़े तुझे सलाम’ भी संग्रह की उल्लेखनीय कविताएं हैं जिनमें अमृतलाल मदान एक आत्मसजग कवि के रूप में सामने आये हैं। ये कविताएं यह भी साबित करती हैं कि वे अपने अर्जित मुहावरे में अपनी बात बखूबी कहना जानते हैं। ‘रंगमार्ग’, ‘पीला पत्ता’ व ‘भव्य और दिव्य’ जैसी कविताएं अपना एक अलग प्रतिसंसार रचती प्रतीत होती हैं। समग्रत: अमृतलाल मदान की कविताएं जीवन का एक व्यापक परिदृश्य उपस्थित करती हैं और अपने रंग-शिल्प की वजह से ये कविताएं अलग भी नजर आती हैं।
०पुस्तक : बूंद-बूंद अहसास ०लेखक : अमृतलाल मदान ०प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन, डीसी निवास के सामने, करनाल रोड, कैथल-136027 (हरियाणा) ०पृष्ठ संख्या : 136 ०मूल्य : रुपये 200/-.

(समीक्षा दैनिक ट्रिब्यून से साभार)

वारिस शाह की हीर की महक है कैथल की मिट्टी में भी

कैथल, हीर, वारिस शाह और अमृता प्रीतम ...इनमें क्या सम्बन्ध है? इनमें क्या सांझा है? इनमें सांझा यह है कि ये पंजाब की ज़मीन से पैदा हुए हैं. तीनों ही मोहब्बत और इश्क में पगे रूहानी किस्म की शख्सियत के मालिक हैं. हीर ने इश्क के लिए अपनी जान दी , वारिस शाह ने उसके दर्द को सूफियाना ऊंचाइयों तक पहुंचाया तो अमृता प्रीतम ने हीर, इश्क और पंजाब की सांझी तहजीब और तारीख पर सियासी खंज़र के घोंपे जाने के दर्द को बिल्कुल नया फलक और आयाम दिया. उनकी नज़्म में बयान दर्द कैथल के बाशिंदों ने भी जिया. आजादी के पहले कैथल पंजाब का हिस्सा था. यह इलाका सिर्फ एक भौगोलिक इलाका नहीं था बल्कि अलग –अलग कौमों , तहजीबों, मज़हब, बोलियों, सूफियों , बेपनाह मोहब्बत, दर्द, तकलीफों और गर्मजोशी को समेटे एक अलग ही शख्सियत रहा है. ऎसी ही शख्सियत कैथल की भी रही है. लेकिन तकसीम और सियासती फरमानों ने मंज़र बदल दिया . पंजाब के साथ कैथल भी रोया . हिंदू- मुस्लिम गंगा- जमुनी संस्कृति वाला कैथल का इलाका उजड़ने लगा . एक सरहद बना दी गई और उसके “इधर” और “उधर” आना-जाना शुरू हुआ. कैथल से भी हज़ारों लोग बाप-दादाओं की पाक ज़मीन को छोड़, माल – असबाब गाड़ियों में लादे , कांख में गठरी दबाये, अपनी औरतों को लुटते देख ,खून के आंसू पीते “उधर” गए और ऐसे हजारो लोग यहाँ आये. रिफ्यूजी कैम्प बनने लगे .कैथल शहर का हर दूसरा और तीसरा बाशिंदा “रिफ्यूजी” बन कर आया. आज भी यहाँ के गाँवों में अपने मूल बाशिंदों को याद करती न जाने कितनी हवेलियाँ खँडहर बन चुकी हैं. हजारों बाशिंदों के ख्यालों में अभी भी अपने वालिदों या अपने बचपन के घरों, गलियों , मोहल्लों , और बाज़ारों को देखने , उनकी दीवारों को एक बार छू लेने, किसी पुराने अमरुद के दरख़्त पर लटक जाने और वहाँ की हवाओं को फेफड़ों में सोख लेने की कशिश बाक़ी है. सैंतालीस में आये बच्चों के चेहरों पर झुर्रियाँ आ गयीं हैं . लेकिन तमाम तकलीफों के बावजूद उन सब ने पंजाब की जिजीविषा , हिम्मत, मोहब्बत ,तहजीब और लगन को इस शहर की हवाओं में घोल सदियों पुराने इस शहर को और भी खूबसूरत बना दिया है. उन्होंने अपनी मेहनत से उद्योग , खेती ,व्यापार से लेकर साहित्य, शिक्षा और कला तक अपनी पहचान और जगह बनाई है. यह शहर हौसले वाला शहर है. और इसे यह हौसला दिया है उजड़ कर आये लोगों ने. यह शहर उन्हें सलाम करता है. यह शहर हीर, वारिस शाह, अमृता प्रीतम और उनकी मोहब्बत को सलाम करता है. यहाँ से उजड कर वहां बसे और वहां से उजड कर यहाँ बसे लोगों के लिए प्रस्तुत है अमृता प्रीतम की यह नज़्म जो उन्होंने विभाजन के बाद लिखी थी..इस नज़्म में उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए कहा है कि जब पंजाब में हीर नाम की एक बेटी रोई थी तो उन्होंने उसके दर्द को संगीत में ढालकर लोकगीत बना दिया...आज जब विभाजन के समय लाखो बेटियां रो-चीख रहीं हैं तो वो बुला रही है वारिस शाह को और पूछ रहीं हैं कि कहाँ है उनके गीत ...सुनिए ये नज़्म खुद अमृता प्रीतम की आवाज़ में: (प्ले बटन पर क्लिक करें, अगर आपका कनेक्शन स्लो है तो 'बफर' होने में कुछ क्षण लग सकते हैं, कृपया प्रतीक्षा करें) -आशु वर्मा