सुने और देखें यह वीडियो.....दर्द मेरा......
कैथलनामा 'सम्भव' द्वारा संचालित साँझा मंच है. कैथल को सन्दर्भ में रखकर स्थानीय एवं मौखिक इतिहास,सांझी संस्कृति और साहित्य पर व्यापक विमर्श का यह एक छोटा सा प्रयास है.साथ ही हमारी कोशिश रहेगी कि आम नागरिकों की समस्याओं के समाधान की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास भी कियें जाएँ.बुद्धिजीवियो,सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, मीडियाकर्मियों,विद्यार्थियों और जागरूक नागरिकों के सहयोग से इस अभियान को सफल बनाया जा सकता है..ऐसी हमारी उम्मीद है.
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बुधवार, 9 जनवरी 2013
सोमवार, 7 जनवरी 2013
रविवार, 30 दिसंबर 2012
मानव गरिमा की मौत
दामिनी की मौत ने सबको विचलित कर दिया ,लेकिन उसने हम सब के सामने कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए.कल कैथल के जाट ग्राउंड से जवाहर पार्क तक एक मौन या यूं कहें की रोष जुलूस निकला जिसमें तमाम संगठनों और शहर के सोचने-समझने वाले लोग शामिल हुए. आज तितरम गाँव में और तितरम मोड़ पर एक सभा हुई और एक परचा बांटा गया .पर्चा प्रस्तुत है आपके लिए. सोचें, बांटे और समाज को बदलने का प्रयास करें...
इस समाज को
लड़कियों के रहने लायक बनाओ
एक लडकी मर गयी..!
तो क्या हुआ...?
रोज़ लड़कियां मरती हैं. ..!!
नहीं, हम उस लडकी की बात कर रहें हैं जो 16 दिसम्बर
की रात को हैवानियत का शिकार हुयी. यह वह लड़की थी जिसे देश की राजधानी दिल्ली में
छ: वहशी लोगों के द्वारा रौंद डाला गया.
आप सब पिछले 12-14 दिनों से सुन
पढ़ रहे होंगे कि एक लड़की पहले दिल्ली और फिर सिंगापुर के एक अस्पताल में ज़िन्दगी
और मौत के बीच झूल रही थी और आखिरकार 28-29 दिसम्बर की
रात को उसने दम तोड़ दिया. मीडिया के माध्यम से हम इस लड़की को दामिनी के नाम से
जानते है. जो कुछ दामिनी ने झेला उसके समक्ष बलात्कार शब्द
बहुत छोटा पड़ जाता है.
“दामिनी” पहली
लड़की नहीं थी, और दामिनी आखिरी लड़की भी नहीं है. न जाने
कितनी दामिनियाँ
रोज़ लुटती-पिटती दम तोड़ देती हैं.
पिछले कुछ अरसे से
अख़बारों में रेप और गैंग रेप की घटनाएँ हम लगातार पढ़ रहे हैं. लोगों में आक्रोश
है, गुस्सा है, शर्म है...प्रशासन और पुलिस से शिकायत है.
लेकिन क्या यह
सिर्फ क़ानून व्यवस्था का मामला है? क्या सिर्फ सख्त कानून भर बना देने से ये
समस्या हल हो जाएगी?
क्या हमारे
सामाजिक ढाँचे का इसमें कोई दोष नहीं है?
क्या बचपन से
लड़की-लड़के में भेदभाव इसका कारण नहीं है?
क्या औरत को एक
सामान्य इंसान और नागरिक ना समझना इसका कारण नहीं है?
क्या पुरुषवादी
मानसिकता और व्यवहार इसके कारण नहीं हैं?
क्या परम्पराएं
इसका कारण नहीं हैं?
क्या बिगड़ता
लिंगानुपात इसका कारण नहीं?
क्या बढती
बेरोज़गारी और नौजवानों का बढ़ता उद्देश्यहीन जीवन इसका कारण नहीं?
क्या फूहड़
फ़िल्में और गाने इसका कारण नहीं?
अगर हम इन सवालों
के उत्तर नहीं खोजेंगे तो दामिनियों की अस्मत लुटती रहेगी...दामिनियाँ मरती
रहेंगीं.अब वक़्त आ गया है कि हम इन सवालों पर गौर करें क्योंकि दामिनियाँ हमारे घर
में ही हैं,हमारे पड़ोस में भी हैं..
आइये, इस समाज को
दामिनियों के रहने लायक बनाएं, ताकि इसे एक सभ्य और सुन्दर समाज कहा जा सके.
“संभव” – ( SOCIAL
ACTION FOR MOBILISATION & BETTERMENT OF HUMAN THROUGH AUDIO-VISUALS) द्वारा
जारी
फोन:9813272061, 9729486502,
9416203045
रविवार, 14 अक्टूबर 2012
मलाला, गजाला और हमारी बबलियाँ
मलाला , गजाला और बबली..... इनमे
क्या कोई सम्बन्ध है?? ये कैसा शीर्षक ? आज दिमाग गड्ड-मड्ड हो रहा है... पिछले
दिनों पाकिस्तानी बच्ची मलाला पर सिर्फ इस बात के लिए हमला हुआ कि वह पढ़ना चाहती
थी.(वो समझती है कि वो इक्कीसवीं सदी में है, बेवकूफ बच्ची ...!) आज शाम समाचार
देखा कि हरियाणा में पिछले चौंतीस दिनों में उन्नीसवां बलात्कार का मामला फतेहाबाद
में हुआ ( ये हिन्दुस्तान है भाई, सरकारी आंकड़ों में कृपया स्वयं सुधार कर लें) और
कुछ ही देर पहले बबली के दाह-संस्कार से लौटी... बबली, ये बबली कौन थी ? मैंने उसे
देखा भी नहीं था....बल्कि आज ही उसका नाम जाना... कृष्ण, मेरे घर जो बच्चा दूध
देने आता है, उसकी बहन...बबली. ब्याह दी गई थी- नहीं-नहीं, आठ साल पहले रिश्तेदारी
में, दे दी गई थी. “अंटा-संटा” यानि अदला-बदली
की “परंपरा” के तहत. कितना आसान तरीका ...! अदला-बदली... वर ढूँढने,
घर, परिवार, जायजाद देखने की ज़हमत भी नहीं उठानी पड़ी. एक खूंटे से दूसरे खूंटे
बांधनी ही तो थी . जल गयी बबली, मर गई बबली...इनवर्टर से ! नया तथ्य है, स्टोव या
गैस से बहुओं का जलना तो सुना था.. पर इनवर्टर
से मौत, पहली बार सुना. खैर...नब्बे प्रतिशत जली बबली मरते-मरते भी कह गई किसी ने
नहीं जलाया मुझे.. मै तो इनवर्टर से जल गई....! बबली के इनवर्टर से जलने पर भरे-पूरे परिवार में उसे
कोई नहीं बचा पाया...! दो दिन अस्पताल में जलने का ज़ख्म बर्दाश्त करती, ससुराल,
मायके और पुलिस वालों से जूझती आखिर उसे “मुक्ति” मिल ही
गई....गाँव की बूढ़ी औरतों ने भी बबली की माँ को समझाया, “रो न, आज तो उसे
मुक्ति मिली है....कितनी शरीफ थी बेचारी. इब तो स्वर्ग पहुंची गई होगी.” इन बुज़ुर्ग
महिलाओं को खासा अनुभव जो था. ठीक ही कह रहीं थीं वे. बबली “नरक” से निकल कर “स्वर्ग” में ही तो गई...“वंश चलाने” के लिए एक बेटे
को छोड़ गई..पता नहीं कब से क्या-क्या झेल रही थी दस साल की शादी.. यह कैसी शादी
थी?? बबली...घरवालों की “इज्ज़त” बचाती रही...रोज़-रोज़ ऑनर-किलिंग होती रही...
रोज़ ही तो मरती
हैं बबलियाँ -“रिपोर्टेड” या “अनरिपोर्टेड". गजाला जावेद को महज़ इसलिए मार दिया गया
कि वो गाती थी, मलाला को इसलिये गोली मार दी गयी कि वह पढ़ना चाहती थी, बबली इसलिए
इनवर्टर से जल गई क्योंकि वह जीना चाहती थी.
जो वहशीपन और बलात्कार का शिकार हो रहीं हैं वह भी तो जीते-जी
मर ही तो रहीं हैं. इन सबका दोष क्या है ? किसने हक दिया उन्हें मारने का? बबलियों
का जीना-मरना कोई और तय करता है...शादी-ब्याह कोई और तय करता है....कहीं खाप तो
कहीं तालिबान फरमान देते हैं कि लडकियां पढाई न करें, शादी की उम्र घटा दी जाए, या
फिर लड़कियों के पहनावे या चाल-चलन को ही बलात्कार का कारण घोषित कर दिया जाता है.
किसी राजनीतिक दल को किसी भी बबली से कोई लेना-देना नहीं.
बबली सिर्फ “बबली” मानी जाती रही
हैं. इन्हें जीता-जागता इंसान मानना शुरू कर दिया जाय तो कोई मलाला नही गोली का
शिकार होगी, कोई बबली नही मारी जायेगी, वहशीपन से इंसानियत शर्मसार नही होती
रहेगी....लेकिन यह सब इतना आसान नहीं है.....फिर भी, बदलना तो पडेगा ही...इंसान की ज़िंदगी का सवाल जो है....
सोमवार, 8 अक्टूबर 2012
ये क्या हो रहा है
ये क्या हो रहा है
पिछले कुछ
हफ्ते हरियाना में बेहद तनावपूर्ण रहे हैं ... लगातार बढ़ती छेड़खानी की
घटनाएं,बलात्कार...पीड़ित लड़की का आत्मदाह ,पिता द्वारा शर्म से आत्महत्या...और साथ
ही अलग – अलग जगहों पर लोगों का,
खासकर,महिलाओं का इसके विरोध में सड़कों पर उतर आना. शहरों में मोमबत्ती मार्च से
लेकर गांव की औरतों का लाठियों के साथ गाँव की सड़कों पर गुस्से का प्रदर्शन ...
बढ़ती बालात्कार की घटनाएं,और उनका संगठित विरोध.. ये दोनों ही हरियाणा के लिए नयी
परिघटना है. यहाँ पिछले कुछ वर्षों में तेज़ी से आर्थिक विकास हुआ है. सेज के नाम
पर ज़मीने ली गयी हैं,लाखों रुपये जितनी तेज़ी से किसानों के पास आये,उतनी ही तेज़ी
से उड़ भी गए. लाखों बेरोजगार हैं और विषम लिंगानुपात के कारण अविवाहित नौजवानों की
संख्या भी तेज़ी से बढ़ी है.. जातिगत राजनीती भी तल्ख़ हो गयी. दलित-जाट सम्बन्ध बेहद
तनावपूर्ण हो रहें हैं.
पिछले दिनों बलात्कार की ज़्यादातर घटनाएँ
दलित लड़कियों के साथ घटीं . ये घटनाएं पुलिस और कानून से कम तो की जा सकतीं हैं,खत्म
नही की जा सकतीं. जब तक महिलाओं के बारे में मध्ययुगीन सोच मौजूद रहेगी,जातिगत
राजनीति मौजूद रहेगी,समाज का ताना-बाना पुरानी तरह का बना रहेगा जिसमें लड़कियाँ निरीह
मानी जाती रहेंगीं और जब तक पुरजोर विरोध नहीं होगा, इन घटनाओं को कम नहीं किया जा सकता.
कैथल में
छेड़खानी के खिलाफ अखबारों ने भी अभियान छेड़ रखा है. पुलिस सक्रिय हुई है. लेकिन अब
समय आ गया है कि हम लड़कियों और औरतों के विषय में नए तरह से सोचना शुरू करें.
उन्हें पढाएं,आर्थिक रूप से आज़ाद होने दें,पितृवादी सोच बदलें..विवाह संबंधी सोच
बदलें...”सम्भव” इन
घटनाओं का विरोध करता है,इसके खिलाफ संघर्ष कर रहे लोगों का समर्थन करता है,और
शीघ्र ही कैथल में संगठित विरोध और प्रदर्शन का आयोजन करने वाला है. इस विरोध में कैथलवासियों का
समर्थन ज़रूरी है. हमें उम्मीद है आप सभी का सहयोग मिलेगा.सोमवार, 1 अक्टूबर 2012
क्या हो रहा है हरियाणा में ?
आये दिन बलात्कार :
ये हो क्या रहा है हरियाणा में? आये कुछ दिन बाद कहीं न कहीं सामुहिक बलात्कार की घटना. सम्मान के लिए हत्या, कन्या भ्रूण हत्या जैसे कलंकों के बाद यही कसर बची थी शायद. सोमवार को भिवानी में एक नाबालिग लड़की से सामुहिक बलात्कार का समाचार है. पिछले हफ्ते सोनीपत के गोहाना कस्बे में ग्यारहवीं कक्षा की एक छात्रा के साथ एक व्यस्त बाज़ार में कहीं बलात्कार की घटना हुई.
इससे पूर्व जींद की महिला के घर तीन व्यक्तियों ने जबरदस्ती घुसकर उसके साथ बलात्कार किया. पीड़ित महिला का कहना है कि बलात्कारियों ने इस जघन्य कृत्य का वीडियो बनाया और धमकी दी कि अगर उसने मुंह खोला तो तो वे इस विडियो को सार्वजनिक कर देंगे.
नौ सितम्बर को हिसार के एक गांव में एक नाबालिग दलित लड़की के साथ आठ व्यक्तियों ने सामुहिक बलात्कार किया. यह मामला घटना के दस दिन बाद प्रकाश में आया था. इस दौरान पीड़ित लड़की अपने-आप में ही घुटती-मरती रही, जब बात बर्दाश्त से बाहर हो गई तो उसने अपने परिवारवालों के समक्ष रोते-बिलखते सारा घटनाक्रम रखा. परिवारजनों ने जब पुलिस में रपट दर्ज कराने का प्रयास किया तो पुलिस ने एफ.आई.आर. तक दर्ज नहीं की. बदनामी के डर से और बेटी के अपमान से टूट चुके बाप ने अगले दिन आत्महत्या कर ली. जब क्षेत्र के लोगों ने दोषियों के पकड़े जाने तक मृतक पिता का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया तो पुलिस ने एक आरोपी को गिरफ्तार कर लिया. इस घटना के बारे में भी खबर है कि आरोपियों ने बलात्कार का वीडियो क्लिप बनाकर उसे एम.एम.एस के ज़रिये अन्य लोगों तक पहुंचा दिया.
बताया जा रहा है कि भिवानी में कल हुई इस जघन्य घटना के पश्चात हरियाणा के पुलिस महानिदेशक ने सभी पुलिस कर्मियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं. बलात्कार - क्या सिर्फ कानून और व्यवस्था का मसला है ?
हरियाणवी समाज पितृसत्तात्मक मूल्यों में जकडा समाज है जहां औरत की स्थिति दोयम दर्जे की है. आर्थिक आंकड़ों के हिसाब से भले ही हरियाणा को अव्वल माना जाने लगा हो लेकिन साँस्कृतिक विकास के मामले में यह सूबा अब भी मध्य युगीन परम्पराओं को ढो रहा है. इन परम्पराओं की गाज लगातार गिरती रही है औरत पर या फिर दलित पर. हरियाणा के तमाम जनचेतना से लैस सामाजिक -सांस्कृतिक संगठनों व बुद्धिजीवियों को मौजूदा स्थिति पर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है. त्वरित कानूनी कार्यवाही से पीड़ित-परिवार के जख्मों पर फौरी तौर पर मरहम तो लगाया जा सकता है लेकिन समाज के इस नासूर से रिश्ते बदबूदार खून को रोकने के लिए बड़ी सर्जरी की आवश्यकता है.
मंगलवार, 11 सितंबर 2012
ममता सौदा-आसमान छूने को बेताब बेटी कैथल की
सात महाद्वीपों की सबसे ऊंची चोटी को फतह करने का ख्वाब देखने वाली ममता सौदा, कैथल की बेटी हैं. कैथल, जहां पहाडियां तो दूर की बात है ऊंचाई के नाम पर कुछ पुराने टीले मौजूद हैं या फिर कुछ तलाई बाज़ार की ऊँची-नीची सड़क या थोड़ी ऊँचाई पर बसा पुराना कैथल शहर,एक ऐसा शहर जहां पर्वतारोहण का कोई इतिहास नहीं मौजूद है, ममता सौदा एक के बाद एक लगातार चोटियाँ फतह करती जा रहीं हैं. ममता ने 22 मई, 2012 को विश्व की सबसे ऊंची चोटी, माउन्ट एवेरेस्ट फतह कर अपने अभियान की शुरुआत की थी. उसके पहले वह कई और ऊँचाईयों को भी फतह कर चुकी थीं. 20 जून 2012 को अफ्रीका के किलिमंजारो चोटी को उन्होंने फतह किया. इसी माह, एक सितम्बर को रूस की सबसे ऊंची चोटी माउन्ट एल्ब्रस पर उन्होंने झंडा फहराया. अपने शहर में लौटने पर ममता का ज़ोरदार स्वागत किया गया.*ममता ने साबित कर दिया है कि लड़कियां शारीरिक रूप से कमजोर नहीं होतीं. लड़कियों को अगर सही खान – पान मिले, सही प्रशिक्षण एवं मार्गदर्शन मिले, उनके परिवार और समाज का समर्थन मिले और सबसे बड़ी बात की उनपर भरोसा किया जाए, तो वे आसमान भी छू सकती हैं. पर्वतारोहण जैसे बेहद कठिन, अत्यधिक शारीरिक मेहनत वाले, निहायत धैर्य और जोखिम भरे कैरियर में तीन चोटियाँ फतह करने के बाद, भी ममता का हौसला बुलंद है. हरियाणा जैसे राज्य जहां बेटियों की भयंकर दुर्दशा है, ममता हम सबके लिए रोशनी बन कर आयी हैं. बाज़ार और पूंजी के सेवक जब लड़कियों को “मिस वर्ल्ड” बनने के सपने दिखा रहें हैं, ऐसे में ममता लड़कियों और हम सबके लिए बेहतरीन आदर्श हैं. माउंट एल्ब्रेस फतह कर लौटने पर “कैथलनामा” ममता, और उनके परिवार को सलाम करता है और भविष्य के लिए शुभकामनाएं देता है.
* (बॉक्स न्यूज़-दैनिक भास्कर के सौजन्य से )
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