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सोमवार, 14 जनवरी 2013

Goa Folk Festival

                         गोवा लोक संस्कृति महोत्सव
                              Goa Folk Festival
                               (21 जनवरी,2013)
                             
                                     




























"संभव" और मल्टी-कल्चरल आर्ट सेंटर, कुरुक्षेत्र के तत्वावधान में आल्योजित "गोवा लोक संस्कृति महोत्सव" में आप सभी आमंत्रित हैं...आशा है आप सभी कार्यक्रम का प्रचार करेंगे और अपने मित्रों और परिवार के साथ   इस कार्यक्रम को सफल बनायेंगे....

स्थान: आर.के.एस.डी.कालेज
समय : शाम सुहानी ( समय जल्दी ही पक्का हो जायेगा)  

सोमवार, 7 जनवरी 2013

दामिनी को श्रद्धांजलि ...एक प्रयास...

तितरम मोड़ पर पर्चा बांटते और पर्चे को पढ़ते साथी ...













































अब वक़्त आ गया है जब हमें स्त्री और लड़कियों के लिए रहने लायक समाज को बनाने के लिए लगातार-
लगातार प्रयासरत रहना पड़ेगा.....

गुरुवार, 1 नवंबर 2012


                              सरस मेला ....कैथल की कहानी और  "सम्भव" की प्रदर्शन

  ज़िंदगी एक मेला है  और मेला ज़िन्दगी .मेलों के बिना ज़िंदगी अधूरी है और मेले ज़िंदगी की रवानी को बनाए रखते हैं.....सदियों से चले आ रहें हैं मेले. ज़िंदगी की जद्दोजहद के बीच मेल-मिलाप, घूमने - फिरने, खाने - पीने ,रौनक देखने, कला के हुनर देखने, खरीद-फरोख्त , किसिम-किसिम के करतब देखने और न जाने क्या-क्या के लिए लगते रहें हैं मेले...
       आजकल कैथल में लगा "सरस मेला" भी लोगों को अपनी ओर खींच रहा है. जगह-जगह से आये शिल्पकार और उनके बेहतरीन सामानों को खरीदने वालों की जहां भीड़ लगी है तो वहीं  शाम को अलग -अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम एक अलग ही समां बांधते हैं. लेकिन इन सबके बीच जो जगह सबसे ज़्यादा लोगों को खींच रही है वह है 'संभव" सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी- "मैं कैथल हूँ ". कैथल के पौराणिक महत्त्व के स्रोतों को बताती कैथल की कहानी ले जाती है हमें सुदूर अतीत में ..... हड़प्पा काल की बस्ती में हुई खुदाई में मिले  पुरातात्विक स्रोतों को प्रस्तुत करती,  कलायत के प्रतिहार राजाओं के भव्य मंदिर को दर्शाती , रजिया के मज़ार की सैर कराती  यह प्रदर्शनी अट्ठारह सौ सत्तावन में कैथल शहर और आस-पास के गाँवों में धधकी ज्वाला का बयान करते स्वतंत्रता आन्दोलन में कैथल की भूमिका और कैथल में गांधी जी के आगमन का ज़िक्र करती है.. यह विभाजन की पीड़ा को भी बताती है...आज़ादी के बाद यहाँ हुए विकास और विडंबनाओं की चर्चा करते हुए अतीत के सांझेपन को बरकरार रखने की  अपील के साथ यह प्रदर्शनी  सामाजिक बदलाव के लिए सबको अपनी भूमिका निभाने का आह्वान करती है ...  
      प्रस्तुत है प्रदर्शनी और मेले की एक झलक..

अपने शहर..अपने अतीत में खुद को तलाशते लोग 

         
             
        प्रदर्शनी में लोग--कैथल की विरासत को देखते और महसूस करते...        



सांझी विरासत....
दो पीढियां ....कैथल को समझने की कोशिश में....
नन्हीं बेतिया...इतिहास को समझने की कोशिश में.....





अरे, ये क्या है??

मेले में........जादू........


















यह मात्र झलक थी..... हम मिलते रहेंगे.....मेले के और भी रंगों के साथ.....

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हज़ारों सालों से "लोक" में बसा फल्गु मेला ..



                  पिछले दिनों गुजरा फल्गु मेला हज़ारों सालों से  कैथल की संस्कृति , इतिहास और लोकजीवन का हिस्सा रहा है. मेलों के बिना  क्या हम किसी समाज की कल्पना कर सकते हैं? इंसान ने जीवन के साथ अपने संघर्ष में हमेशा जीवन को सुन्दर बनाने की कोशिश की है....मेले ज़िंदगी को खूबसूरत बनाते रहें हैं. ज्यादातर मेलों के पीछे कोई धार्मिक कहानी भले ही रही है , लेकिन वास्तविकता यह है कि मेले जी - तोड़ मेहनत के बाद अपने बाल-बच्चों और परिवार के साथ घर से बाहर निकल कर पूरे समुदाय के साथ मौज- मस्ती और खुशियाँ मनाने का एक बहाना भी रहा है. भोजपुरी के महान  लोककवि  और गीतकार  कैलाश गौतम की लोकप्रिय कविता "अमौसा के मेला" (अमावस्या का मेला) की कुछ पंक्तियाँ आपके लिए प्रस्तुत हैं जो  यहाँ बेहद मौजूं है...

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 भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा.
अगल में, बगल में,सगल गाँव देखा, 
अमौसा नहाए चलल गाँव देखा.
.......
  फल्गु मेले का इस पूरे इलाके में बहुत ज़्यादा महत्व रहा है.  इस इलाके के लोग तो यहाँ पितरों की पूजा और दान के लिए आते ही हैं, ऐसे लोग जो कई पीढी पहले कैथल से किसी दूसरी जगह जाकर बस गए, वे भी यहाँ अवश्य आते हैं.
      "कैथलनामा" टीम ने भी फल्गु मेले का आनंद उठाया. अदभुत नज़ारा था. पंजाब से लेकर राजस्थान तक के लोग हज़ारों लोग, बड़े - बूढ़े,  औरतें  और बच्चों का सैलाब... सारा इलाका  कोलाहल में डूबा, धर्म जाति के बंधनों को तोड़ता ...जीवन का भरपूर आनंद उठाता...
   कुछ खुशनुमा पलों को हमने कैमरे  में कैद किया. प्रस्तुत है आपके लिए एक एल्बम..




 इसे कहते हैं जिजीविषा.... राजस्थान से आयीं दादी ...

                             
                                 

खजाला.... यू.पी. में इसे खाजा कहते हैं. अब मेलों में ही दिखता है. मेले वास्तव में संस्कृति को कितना बचा कर रखते है... और संस्कृति को कौन बचाए रखता है?? आम लोग...सदियों से संस्कृति आम लोगों के कारण ही बची रही 




एक दूसरे को संभालती ...दो पीढियां ....चली मेला देखन को...




झूले... इनके बिना मेला पूरा नहीं होता...दिल थाम कर बैठते हैं लोग इस पर...देसी टेक्नोलोजी, देसी हुनर... 
 
उदास क्यों है बच्चा...वो भी मेले में ??







 पितरों को याद करते.


प्लास्टिक के खिलौनों ने मिट्टी के खिलौनों की जगह ले ली है...फिर भी खिलौने, खिलौने हैं ...बच्चों के लिए ज़रूरी. इस बच्चे को भी खिलौने से खेलने की फुर्सत मिलती होगी क्या ?
नट-नटी..यह संतुलन बनाने में कितनी मेहनत छिपी है...जिसकी कोई कद्र नहीं...इन्हें कोई संभाल ले तो ये सोना ले आयें ओलम्पिक में...

जलेबा...

और अंत में मौत का कुआं ...जीवन के लिए मौत का कुआं....

गुरुवार, 6 सितंबर 2012

किला कैथल का

कैथल के समृद्ध इतिहास का गवाह -किला कैथल का-आज भी शहर को गुज़रे कल की याद दिलाता है.
(किले के बारे में विस्तार से किसी अगली पोस्ट में)
तस्वीर: साथी बी.डी. के सौजन्य से