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मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

सुनिए फरहत साहब की आवाज़


फरहत शहजाद की शायरी और मेहंदी साहब की मौसिकी दोनों के मिलन ने अदब और तहजीब को एक अलग ही ऊंचाई तक पहुंचाया .पेश है आपके लिए चाँद गज़लें...


                                  तुम्हारे साथ भी तनहा हूँ....
              {सुनने के लिए विडिओ के बीच में बने तीर के निशाँ को क्लिक करें}

रविवार, 16 दिसंबर 2012

कैथल की सरज़मीन का एक सिलसिला



                  उजाला इसकदर बेनूर क्यों है   
           किताबें ज़िन्दगी से दूर क्यों हैं

ये कहना है उर्दू के अज़ीम शायर जनाब फरहत शहजाद का. फरहत साहब जो समकालीन उर्दू शायरी का एक ऐसा नाम है जिसकी शायरी को भारतीय उपमहाद्वीप के सभी फनकारों ने अपनी आवाज़ दी है. इनकी पहली ग़ज़ल मेहंदी हसन साहब ने गाई और उनकी ही गज़ल मेहंदी साहब की आखिरी ग़ज़ल बनी. यही फरहत साहब अपनी जड़ों को तलाशते कल कैथल में थे. इनके वालिद तकसीम के समय पाकिस्तान के डेरा गाजी खान चले गए थे जहां फरहत साहब का जन्म हुआ.
     फरहत साहब यूं तो पिछले 35 सालों से अमरीका में हैं, लेकिन उनकी रूह यहीं गंगा-सतलुज और सिन्धु के मैदानों में मंडराती रहती है. साल के पांच-छह महीने वे यहीं गुजारते हैं. अपने पुरखों की सरज़मीन को देखने, उसे सिजदा करने, उसे छूने और महसूस करने की चाह उन्हें कैथल ले आयी और कल वे अपने अज़ीज़ दोस्तों जनाब दिनेश यादव और तरुण वर्मा के साथ अपने वालिद और अपनी अम्मी के घर गए . वक़्त ने हांलाकि मंज़र बदल दिया है, हवेली के आसपास बाज़ार उग आया है, फिर भी फरहत साहब को वहा की गलियों, वहाँ की हवा, पेड़ों, घरों, इधर-उधर डोलते पिल्लों और यहाँ तक की नालियों को देख कर महसूस हुआ जैसे वो अपने घर, अपने अब्बा के घर आये हैं ....अपनी अम्मी के घर.........आये हैं .....
   वे उस मस्जिद में भी गए जहां कभी उनके अब्बा जाया करते थे. आसपास के बाशिंदों से बात कर जैसे उनकी रूह को सुकून सा मिला.
   शाम को शहर के बाशिंदों ने उनका इस्तकबाल किया. कोयल काम्प्लेक्स में तकसीम(विभाजन) के समय उजड़ कर कैथल आये लोग उनकी एक झलक लेना चाहते थे....प्राध्यापक, दुकानदार, सरकारी मुलाजिम भी जिनके परिवार उधर से आये थे और जिन्हें अपने ज़मीन की खुशबू लेकर आये फरहत साहब को सिजदा करना था, वहां मौजूद थे.
       आये हुए लोगों की मुहब्बत फरहत साहब की आँखों को नम कर गयी. उन्होंने कहा की इतिहास में जो कुछ घट चूका है उसे हम बदल नहीं सकते....लेकिन हम आने वाले समय को बेहतर बना सकते हैं. दोनों मुल्कों का माजी (अतीत) एक रहा है, दोनों की आबो-हवा एक है, तहजीब एक है.....और लोग एक हैं जो अमन और शान्ति चाहते हैं. उन्होंने कहा की कुछ ही लोग हैं जो बुरा चाहते हैं, बाकी अवाम तो हमेशा बेहतरी चाहती है. हमें अवाम पर भरोसा करना चाहिए. दोनों मुल्कों के अमनपरस्त साहित्यकारों,  फिल्मकारों, फनकारों और पढ़े-लिखे लोगों की सांझी कोशिश से ही मुहब्बत को कायम रखा जा सकता है.
    
       कार्यक्रम के दौरान गंगा-जमुनी संस्कृति की बेहतरीन मिसाल देखने को मिली. मुल्तान से आकर बसे अजीम शायर राणा प्रताव गंनौरी साहब ने मुल्तानी में नज्में पढ़ीं. वो अभी भी अपनी माँ-बोली को जिंदा रखे हुए हैं. तो दूसरी तरफ फरहत साहब ने भी ठेठ हरियाणवी में किस्से सुनाये. यहाँ डेरा गाजी खान के दो बेटे भी पहली बार आपस में मिले, एक फरहत साहब तो दूसरे कैथल के जानेमाने साहित्यकार डा. अमृत लाल मदान. मदान साहब और उनकी पत्नी का परिवार विभाजन के समय डेरा गाजी खान से यहाँ आकर बसा था.
    फरहत साहब ने बताया की उनकी पत्नी हिन्दुस्तान से हैं. और वे जल्दी ही देवनागरी पढ़ना और लिखना सीखने जा रहें हैं ताकि वे हिंदी रचनाकारों को भी पढ़ सकें. फरहत साहब न जाने कितनों की ख्वाहिशें बन कर यहाँ आये थे. उनके मार्फ़त न जाने कितने लोगों ने अपनी ज़मीन को सिजदा किया. न जाने वे कितनों के दिलों में अपनी ज़मीन को बस एक बार देखने की ख्वाहिशें जगा गए. उनके अब्बा ने उनसे कहा था, फरहत, मुझे हज पर भले ही न ले जाना, पर एक बार कैथल ज़रूर दिखा देना. अब्बा की ख्वाहिश तो सियासी दांव-पेंचों मे उलझ कर रह गयीं पर फरहत साहब को ज़रूर सुकून मिला होगा. और हम सब उन्हें देख कर कृतार्थ हुए.......


         

गुरुवार, 1 नवंबर 2012


                              सरस मेला ....कैथल की कहानी और  "सम्भव" की प्रदर्शन

  ज़िंदगी एक मेला है  और मेला ज़िन्दगी .मेलों के बिना ज़िंदगी अधूरी है और मेले ज़िंदगी की रवानी को बनाए रखते हैं.....सदियों से चले आ रहें हैं मेले. ज़िंदगी की जद्दोजहद के बीच मेल-मिलाप, घूमने - फिरने, खाने - पीने ,रौनक देखने, कला के हुनर देखने, खरीद-फरोख्त , किसिम-किसिम के करतब देखने और न जाने क्या-क्या के लिए लगते रहें हैं मेले...
       आजकल कैथल में लगा "सरस मेला" भी लोगों को अपनी ओर खींच रहा है. जगह-जगह से आये शिल्पकार और उनके बेहतरीन सामानों को खरीदने वालों की जहां भीड़ लगी है तो वहीं  शाम को अलग -अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम एक अलग ही समां बांधते हैं. लेकिन इन सबके बीच जो जगह सबसे ज़्यादा लोगों को खींच रही है वह है 'संभव" सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी- "मैं कैथल हूँ ". कैथल के पौराणिक महत्त्व के स्रोतों को बताती कैथल की कहानी ले जाती है हमें सुदूर अतीत में ..... हड़प्पा काल की बस्ती में हुई खुदाई में मिले  पुरातात्विक स्रोतों को प्रस्तुत करती,  कलायत के प्रतिहार राजाओं के भव्य मंदिर को दर्शाती , रजिया के मज़ार की सैर कराती  यह प्रदर्शनी अट्ठारह सौ सत्तावन में कैथल शहर और आस-पास के गाँवों में धधकी ज्वाला का बयान करते स्वतंत्रता आन्दोलन में कैथल की भूमिका और कैथल में गांधी जी के आगमन का ज़िक्र करती है.. यह विभाजन की पीड़ा को भी बताती है...आज़ादी के बाद यहाँ हुए विकास और विडंबनाओं की चर्चा करते हुए अतीत के सांझेपन को बरकरार रखने की  अपील के साथ यह प्रदर्शनी  सामाजिक बदलाव के लिए सबको अपनी भूमिका निभाने का आह्वान करती है ...  
      प्रस्तुत है प्रदर्शनी और मेले की एक झलक..

अपने शहर..अपने अतीत में खुद को तलाशते लोग 

         
             
        प्रदर्शनी में लोग--कैथल की विरासत को देखते और महसूस करते...        



सांझी विरासत....
दो पीढियां ....कैथल को समझने की कोशिश में....
नन्हीं बेतिया...इतिहास को समझने की कोशिश में.....





अरे, ये क्या है??

मेले में........जादू........


















यह मात्र झलक थी..... हम मिलते रहेंगे.....मेले के और भी रंगों के साथ.....

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हज़ारों सालों से "लोक" में बसा फल्गु मेला ..



                  पिछले दिनों गुजरा फल्गु मेला हज़ारों सालों से  कैथल की संस्कृति , इतिहास और लोकजीवन का हिस्सा रहा है. मेलों के बिना  क्या हम किसी समाज की कल्पना कर सकते हैं? इंसान ने जीवन के साथ अपने संघर्ष में हमेशा जीवन को सुन्दर बनाने की कोशिश की है....मेले ज़िंदगी को खूबसूरत बनाते रहें हैं. ज्यादातर मेलों के पीछे कोई धार्मिक कहानी भले ही रही है , लेकिन वास्तविकता यह है कि मेले जी - तोड़ मेहनत के बाद अपने बाल-बच्चों और परिवार के साथ घर से बाहर निकल कर पूरे समुदाय के साथ मौज- मस्ती और खुशियाँ मनाने का एक बहाना भी रहा है. भोजपुरी के महान  लोककवि  और गीतकार  कैलाश गौतम की लोकप्रिय कविता "अमौसा के मेला" (अमावस्या का मेला) की कुछ पंक्तियाँ आपके लिए प्रस्तुत हैं जो  यहाँ बेहद मौजूं है...

................................................
 भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा.
अगल में, बगल में,सगल गाँव देखा, 
अमौसा नहाए चलल गाँव देखा.
.......
  फल्गु मेले का इस पूरे इलाके में बहुत ज़्यादा महत्व रहा है.  इस इलाके के लोग तो यहाँ पितरों की पूजा और दान के लिए आते ही हैं, ऐसे लोग जो कई पीढी पहले कैथल से किसी दूसरी जगह जाकर बस गए, वे भी यहाँ अवश्य आते हैं.
      "कैथलनामा" टीम ने भी फल्गु मेले का आनंद उठाया. अदभुत नज़ारा था. पंजाब से लेकर राजस्थान तक के लोग हज़ारों लोग, बड़े - बूढ़े,  औरतें  और बच्चों का सैलाब... सारा इलाका  कोलाहल में डूबा, धर्म जाति के बंधनों को तोड़ता ...जीवन का भरपूर आनंद उठाता...
   कुछ खुशनुमा पलों को हमने कैमरे  में कैद किया. प्रस्तुत है आपके लिए एक एल्बम..




 इसे कहते हैं जिजीविषा.... राजस्थान से आयीं दादी ...

                             
                                 

खजाला.... यू.पी. में इसे खाजा कहते हैं. अब मेलों में ही दिखता है. मेले वास्तव में संस्कृति को कितना बचा कर रखते है... और संस्कृति को कौन बचाए रखता है?? आम लोग...सदियों से संस्कृति आम लोगों के कारण ही बची रही 




एक दूसरे को संभालती ...दो पीढियां ....चली मेला देखन को...




झूले... इनके बिना मेला पूरा नहीं होता...दिल थाम कर बैठते हैं लोग इस पर...देसी टेक्नोलोजी, देसी हुनर... 
 
उदास क्यों है बच्चा...वो भी मेले में ??







 पितरों को याद करते.


प्लास्टिक के खिलौनों ने मिट्टी के खिलौनों की जगह ले ली है...फिर भी खिलौने, खिलौने हैं ...बच्चों के लिए ज़रूरी. इस बच्चे को भी खिलौने से खेलने की फुर्सत मिलती होगी क्या ?
नट-नटी..यह संतुलन बनाने में कितनी मेहनत छिपी है...जिसकी कोई कद्र नहीं...इन्हें कोई संभाल ले तो ये सोना ले आयें ओलम्पिक में...

जलेबा...

और अंत में मौत का कुआं ...जीवन के लिए मौत का कुआं....

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

ऐ हुस्न हकीकी - नूर - ए - असल


              ऐ हुस्न हकीकी - नूर - ए - असल
                                      ---अरीब अजहर   
 कौन कहता है कि हिन्दुस्तानी उपमहाद्वीप से गंगा जामुनी तहजीब खत्म हो  गई है... पाकिस्तान के नागमानिगार और गायक अरीब अजहर गाते हैं
            ऐ हुस्न - हकीकी नूर असल
            तनु बादल बरखा  दाज  कहूँ
            तनु आब कहूँ तनु ख़ाक कहूँ
            तनु दसरत लिछमन राम कहूँ
            तनु किसन कन्हैया कान कहूँ
            तनु ब्रह्मा किशन गणेश  कहूँ  
            महादेव कहूँ भगवान कहूँ
            तनु नूह कहूँ तूफ़ान कहूँ  
            तनु  इब्राहिम खलील कहूँ
            तनु मूसा बिन इमरान कहूँ  
            तनु सुर्खी बीड़ा पान कहूँ
            तनु तबला तय तम्बूर कहूँ
            तनु  ढोलक सुर तय  तान कहूँ

    यह गीत, यह शायरी हिंदू की है या  मुसलमान की ? यह शायरी हिन्दुस्तान की है या  पाकिस्तान की? इसे हम कैसे बाँट सकते हैं ? यहाँ तो कृष्ण - कन्हैया , मूसा, इब्राहिम से लेकर गीत - संगीत और सबसे बड़ी बात मिली जुली तहजीब में रचा-पगा इंसान तक सांझा है .  भक्ति, सूफी , इश्क , मोहब्बत में डूबा , अल्लाह, मूसा, राम और कन्हैया से गुफ्तगू  करता,  अनहद की ऊंचाइयों तक पहुंचाता पेश है  अरीब अजहर  का यह नगमा कैथलनामा की ओर से ---   
( सौजन्य : कोक स्टूडियो )
  

सोमवार, 17 सितंबर 2012

एक बेबाक शायर : हाली पानीपती

हिन्दुस्तानी तहजीब की तरह हरियाणा की तहजीब और परम्परा भी हमेशा से बहुलतावादी रही है. लेकिन पिछले कुछ समय से तहजीब और संस्कृति को खास चश्मों से देखने की रवायत चल पड़ी है. तारीख भुलाई जाती रही है और गंगा -जमुना संस्कृति की तो बात करना भी वक्त जाया करना माना जाता है. ऐसे में “कैथलनामा” की बराबर यह कोशिश रहेगी कि हरियाणा और विशेषकर कैथल के सांझे इतिहास को याद किया जाए, उसे घर-घर पहुंचाया जाये और एक सांस्कृतिक आंदोलन की शरुआत की जाये . मीर, ग़ालिब , जौक उन्नीसवीं सदी के हिन्दोस्तान के चमकते शायर थे . उनमें एक शायर और भी था जिसका अंदाज़े बयान कुछ अलग ही था. अल्ताफ हुसैन हाली पानीपती , इनकी काबिलियत को ग़ालिब ने भी स्वीकारा और कहा , “हालांकि मैं किसी को शायरी करने की इजाज़त नहीं देता , लेकिन तुम्हारे बारे में मेरा कहना है कि तुम शेर नहीं कहोगे तो तो अपने दिल पर भारी अत्याचार करोगे.” अल्ताफ हुसैन हाली, पानीपत, हरियाणा के रहने वाले थे, और अपने ज़माने के तल्ख़ हालातों पर बेबाक शायरी करने की वजह से “हाली” कहलाये, जिसे बाद में उन्होंने अपना तखल्लुस बना लिया . हाली ने शराब और शबाब से इतर अपनी शायरी को अपने समय के कड़वे सच से नवाजा . उनका समय (1837--1914) हिन्दोस्तान के लिए बेतरह उथल-पुथल भरा समय था. एक तरफ बर्तानियाई हुकूमत , तो दूसरी तरफ हिंदू- मुसलमान में बांटा जाता आवाम. वे फटकारते हैं इस आवाम को –
 तुम अगर चाहते हो मुल्क की खैर
 न किसी हम वतन को समझो गैर
 हो मुसलमान उसमें या हिंदू
 बौद्ध मज़हब हो या के हो बरहमू
सबको मीठी निगाह से देखो समझो
आँखों की पुतलियाँ सबको
 अपने मुल्क के लिए बेपनाह मोहब्बत ही हाली को मुल्क की लगातार होती जा रही बर्बादी पर सोचने के लिए परेशान करती रही. वे सोचते रहे और लिखते रहे कि उसे और – और खूबसूरत कैसे बनाया जाए. वे धन के लालच में किसी सुलतान की खिदमत में अपनी मिट्टी छोड़ कहीं और जाने के बजाय अपनी मिट्टी में मिल जाने की ख्वाहिश रखते थे—
 तेरी एक मुश्ते ख़ाक के बदले
 लूं न हरगिज़ अगर बहिश्त मिले
 हाली ऐसे शायर नहीं थे कि जब दिल्ली और पूरा मुल्क 1857 की ग़दर में धधक रहा हो, वे हुस्न की शायरी करें. नहीं, बल्कि दिल्ली और आवाम की बर्बादी से वे हिल गए और उनकी कलम ने लिखा—
 तज़किरा देहली – ए—मरहूम का अय दोस्त न छेड़
 न सुना जाएगा हम से यह फसाना हर्गिज़
 मिट गए तेरे मिटाने के निशाँ भी अब तो
 अय फलक इससे ज़्यादा न मिटाना हर्गिज़
 मेहनतकशों की मेहनत को सलाम करते हुए उनकी लूट पर वे जो लिखते हैं वह आज की ग्लोबल अर्थव्यवस्था में कामगारों की मेहनत की लूट पर भी बिल्कुल सटीक बैठता है—
 नौकरी ठहरी है ले दे के अब औकात अपनी
 पेशा समझे थे जिसे, हो गई वो ज़ात अपनी
 अब न दिन अपना रहा और न रही रात अपनी
 जा पड़ी गैर के हाथों में हर एक बात अपनी
 हाथ अपने दिले आज़ाद से हम खो बैठे
 एक दौलत थी हमारी सो उसे खो बैठे
 अपने समय के दर्द को बेहद सरल और खूबसूरत ढंग पेश करने के साथ ही हाली पानीपती को सबसे ज़्यादा जिस बात के लिए सलाम किया जाना चाहिए वह है औरतों का मसला. यकीन नहीं होता कि आज से डेढ़ सौ साल पहले एक शायर इतनी संजीदगी से औरतों की ज़िंदगी को, उनके दर्द को, उनकी गुलामी को , देख और महसूस कर रहा था.
 ज़िंदा सदा जलती रहीं तुम मुर्दा ख्वाहिशों के साथ
 और चैन से आलम रहा ये सब तमाशे देखता
 ब्याहाँ तुम्हें या बाप ने ऐ बे ज़बानों इस तरह
 जैसे किसी तकसीर पर मुजरिम को देते हैं सज़ा
 ताज्जुब होता है कि इतने सालों पहले वे औरत - मर्द की बराबरी की बात करते हैं... .................
 शौहर हूँ उस में या पिदर ,या हूँ बिरादर या पिसर
 जब तक जियो तुम इल्मो दानिश से रहो महरूम यां
 आयी हो जैसी बे खबर वैसी ही जाओ बे खबर
 जो इल्म मर्दों के लिए समझा गया आबे हयात
 ठहरा तुम्हारे हक में वो ज़हरे हलाहिल सर बसर
 उन्होंने औरतों के प्रति ज़ुल्म और आखिरकार उनकी जीत का हौसला दिलाया. हाली ने हमेशा औरतों को सलाम किया और कहा---
 ऐ माओं , बहनों , बेटियों , दुनिया की जीनत तुमसे है
 मुल्कों की बस्ती हो तुम्हीं, कौमों की इज्ज़त तुमसे है
 तुम हो तो ग़ुरबत है वतन ,
तुम बिन है वीराना चमन हो देस या परदेस जीने की हलावत तुम से है
 मोनिस हो खाविन्दों की तुम , गम ख्वार फ़र जन्दों की तुम
 तुम बिन है घर वीरान सब , घर भर की बरकत तुम से है
 तुम आस हो बीमार की , उसरत में इशरत तुम से ............

. था पालना औलाद का मर्दों के बूते से सिवा
 आखिर ये ऐ दुखियारों ! खिदमत तुम्हारे सर पड़ी ...............

 अक्सर तुम्हारे कत्ल पर
 कौमों ने बांधी है कमर
 दें ताके तुम को यक क़लम,
 खुद लोहे हस्ती से मिटा गाड़ी गई तुम
 मुद्दतों मिट्टी में जीती जागती
 हामी तुम्हारा था मगर कोई नं जुज़ जाते खुदा

 ये तो कुछ आधी-अधूरी नज्में हैं.पूरी की पूरी यहाँ देना संभव नहीं है. हाली अपने समय के अफ़सानागार थे जिन्होंने शायरी में अपनी बात कही .समाज में मौजूद ऊंच – नीच , भेदभाव, कट्टरपन, अतार्किकता, सभी पर बेहद सरल भाषा में चोट की .महात्मा गांधी तक उनसे प्रभावित होकर उनसे कहते हैं, ”अगर हिन्दुस्तानी ज़ुबान का कोई नमूना पेश किया जा सकता है तो वो मौलाना हाली की नज़्म “मुनाजाते बेवा” का है .” हाली ने इतना कुछ लिखा कि उसे एक दिन में बयान कर देना गुस्ताखी होगी .आने वाले समय में हम कैथलनामा के मार्फ़त हाली पानीपती की और भी नज्में और उनकी ज़िंदगी से जुड़े वाक्यों से आपको रू-ब-रू कराते रहेंगे. उम्मीद है एक बेहद बड़े शायर पर बेहद मामूली सा हमारा यह प्रयास आपको पसंद आएगा और आप अपने सुझावों के द्वारा इसे बेहतर बनायेंगे. (आभार –डा.सुभाष चन्द्र एवं राम मोहन राय की पुस्तक “नवजागरण के अग्रदूत अल्ताफ हुसैन हाली पानीपती ,चुनिन्दा नज्मे और गजलें” के आधार पर )

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कितने कैथल ?

कैथल सिर्फ किसी एक भौगोलिक इकाई का नाम नहीं है. दुनिया में जगह-जगह कैथल हैं और हर कैथल में जगह-जगह अलग दुनिया है. हर कैथल की पीड़ा सांझी है. हर पीड़ा का कैथल साँझा है. सियासतें, घटनाएँ और तारीख लोगों को उजाड़ कर भले ही एक जगह से दूसरी जगह पर धकेल दें पर लोगों की यादों, तहजीब, खान-पान, रवायतों और बोलियों को क्या कभी वे बदल पाएं हैं? कागज पर नक्शा खींच कर सरहद के ‘इधर’ और ‘उधर’ पहुंचा दिए गए लोग जिस मिट्टी में पले-बढे हों और वहीं-कहीं तोतली जबान को बोलते हुए भाषा सीखी हो, जहाँ का गीत-संगीत, मुहावरे, गालियाँ और..और भी न जाने क्या-क्या अपने खून में रचाया बसाया हो उस मिट्टी की महक को भला कौन सियासत मिटा सकी है, मिटा पायेगी? सपनो, खुशियों और स्यापों के साये मजबूती से उनका दामन पकड़े साथ-साथ चलते हैं ताउम्र.... तकसीम के समय गहरी पीड़ा, आंसूओं और छलनी हो चुके दिलों के साथ लाखों लोग इधर से उधर या उधर से इधर भेज दिए गए लेकिन उनकी माँ बोली उनके साथ बनी रही. अपनी जुबान, तहजीब और अपनी मिट्टी की यादों को संजो कर रखने वाले लोग सरहद के दोनों ओर हैं. ऐसे ही लोगों से तहजीब बची रहती ओर बिखरती जाती है ओर आने वाली पीढियां उसे थामे रहती हैं. तकसीम के वक्त हरियाणा से पाकिस्तान गए लोंगो ने आज भी अपनी मा.बोली हरियाणवी को जिन्दा रखा है और इधर राणा प्रताप गन्नौरी जैसी शख्सियतों ने अपनी माँ-बोली मुलतानी में ढेरों नज्में लिख कर अपनी मिट्टी की महक को जिंदा रखा है. सांझी विरासत की ऐसी मिसालों से ही अमन की मशालें रोशन हैं. देखिये ये दोनों वीडियो...

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

फरहत शहजाद का कैथल

सिरजन की आखिरी शाम को संस्कृतिकर्मी मित्र एवं वर्तमान में अतिरिक्त उपायुक्त, कैथल दिनेश सिंह यादव ने अपने कुछ संस्मरण साँझे किये. जाने-माने शायर फरहत शहजाद के पूर्वज मूलतः कैथल से थे और विभाजन के समय उनका परिवार पाकिस्तान चला गया था. कुछ साल पहले फरहत अपने सखा दिनेश के साथ अपने पुरखों की मिट्टी को सजदा करने आये थे. जब दिनेश ने फरहत से पूछा कि आपको यहाँ आकर कैसा लग रहा है तो फरहत का जवाब था कि मुझे ऐसा लग रहा है मानों मैंने अपने अब्बू को हज करा दिया है. उल्लेखनीय है कि फरहत शहजाद की शायरी को मेहंदी हसन सहित कई कलाकारों ने अपनी आवाज दी है. हाल ही में हुई एक बातचीत में फरहत ने बताया कि जैसे ही मौका मिला वे एक बार फिर इस शहर में आना चाहेंगे. कैथल को फरहत की प्रतीक्षा है. सुनिए दिनेश सिंह यादव के संस्मरण और थोड़ी सी शायरी...

रविवार, 9 सितंबर 2012

वारिस शाह की हीर की महक है कैथल की मिट्टी में भी

कैथल, हीर, वारिस शाह और अमृता प्रीतम ...इनमें क्या सम्बन्ध है? इनमें क्या सांझा है? इनमें सांझा यह है कि ये पंजाब की ज़मीन से पैदा हुए हैं. तीनों ही मोहब्बत और इश्क में पगे रूहानी किस्म की शख्सियत के मालिक हैं. हीर ने इश्क के लिए अपनी जान दी , वारिस शाह ने उसके दर्द को सूफियाना ऊंचाइयों तक पहुंचाया तो अमृता प्रीतम ने हीर, इश्क और पंजाब की सांझी तहजीब और तारीख पर सियासी खंज़र के घोंपे जाने के दर्द को बिल्कुल नया फलक और आयाम दिया. उनकी नज़्म में बयान दर्द कैथल के बाशिंदों ने भी जिया. आजादी के पहले कैथल पंजाब का हिस्सा था. यह इलाका सिर्फ एक भौगोलिक इलाका नहीं था बल्कि अलग –अलग कौमों , तहजीबों, मज़हब, बोलियों, सूफियों , बेपनाह मोहब्बत, दर्द, तकलीफों और गर्मजोशी को समेटे एक अलग ही शख्सियत रहा है. ऎसी ही शख्सियत कैथल की भी रही है. लेकिन तकसीम और सियासती फरमानों ने मंज़र बदल दिया . पंजाब के साथ कैथल भी रोया . हिंदू- मुस्लिम गंगा- जमुनी संस्कृति वाला कैथल का इलाका उजड़ने लगा . एक सरहद बना दी गई और उसके “इधर” और “उधर” आना-जाना शुरू हुआ. कैथल से भी हज़ारों लोग बाप-दादाओं की पाक ज़मीन को छोड़, माल – असबाब गाड़ियों में लादे , कांख में गठरी दबाये, अपनी औरतों को लुटते देख ,खून के आंसू पीते “उधर” गए और ऐसे हजारो लोग यहाँ आये. रिफ्यूजी कैम्प बनने लगे .कैथल शहर का हर दूसरा और तीसरा बाशिंदा “रिफ्यूजी” बन कर आया. आज भी यहाँ के गाँवों में अपने मूल बाशिंदों को याद करती न जाने कितनी हवेलियाँ खँडहर बन चुकी हैं. हजारों बाशिंदों के ख्यालों में अभी भी अपने वालिदों या अपने बचपन के घरों, गलियों , मोहल्लों , और बाज़ारों को देखने , उनकी दीवारों को एक बार छू लेने, किसी पुराने अमरुद के दरख़्त पर लटक जाने और वहाँ की हवाओं को फेफड़ों में सोख लेने की कशिश बाक़ी है. सैंतालीस में आये बच्चों के चेहरों पर झुर्रियाँ आ गयीं हैं . लेकिन तमाम तकलीफों के बावजूद उन सब ने पंजाब की जिजीविषा , हिम्मत, मोहब्बत ,तहजीब और लगन को इस शहर की हवाओं में घोल सदियों पुराने इस शहर को और भी खूबसूरत बना दिया है. उन्होंने अपनी मेहनत से उद्योग , खेती ,व्यापार से लेकर साहित्य, शिक्षा और कला तक अपनी पहचान और जगह बनाई है. यह शहर हौसले वाला शहर है. और इसे यह हौसला दिया है उजड़ कर आये लोगों ने. यह शहर उन्हें सलाम करता है. यह शहर हीर, वारिस शाह, अमृता प्रीतम और उनकी मोहब्बत को सलाम करता है. यहाँ से उजड कर वहां बसे और वहां से उजड कर यहाँ बसे लोगों के लिए प्रस्तुत है अमृता प्रीतम की यह नज़्म जो उन्होंने विभाजन के बाद लिखी थी..इस नज़्म में उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए कहा है कि जब पंजाब में हीर नाम की एक बेटी रोई थी तो उन्होंने उसके दर्द को संगीत में ढालकर लोकगीत बना दिया...आज जब विभाजन के समय लाखो बेटियां रो-चीख रहीं हैं तो वो बुला रही है वारिस शाह को और पूछ रहीं हैं कि कहाँ है उनके गीत ...सुनिए ये नज़्म खुद अमृता प्रीतम की आवाज़ में: (प्ले बटन पर क्लिक करें, अगर आपका कनेक्शन स्लो है तो 'बफर' होने में कुछ क्षण लग सकते हैं, कृपया प्रतीक्षा करें) -आशु वर्मा

शनिवार, 8 सितंबर 2012

सांझी विरासत पर प्रदर्शनी

पिछले दिनों कैथल में 'सम्भव'द्वारा कैथल की सांझी विरासत पर एक भव्य फोटो प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था. शहर के और दूर-दराज से आए सैकड़ों लोगों ने सम्भव के इस प्रयास को सराहा. इस प्रदर्शनी के आयोजन में सम्भव कार्यसमिति की मुख्य सदस्य डा.आशु वर्मा ने,जो स्वयं इतिहास की अध्यापिका हैं विशेष भूमिका निभाई थी. रामफल, संतरो, सत्यवान, गुरप्रीत, सोनिया,सुरेन्द्रपाल,विक्रम व् सम्भव के अन्य कई कार्यकर्ताओं ने इस प्रदर्शनी के संजोने में विशेष सहयोग किया था. शहर के संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों का भी इस प्रदर्शनी के सफल आयोजन में विशेष योगदान दिया. प्रदर्शनी में आए स्थानीय नागरिकों ने कैथल के इतिहास और संस्कृति के बारे में टीम को कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं थी. शहरवासियों के इस उत्साहवर्धन ने सम्भव को स्थानीय इतिहास और संस्कृति पर दीर्घकालिक प्रोजेक्ट के तौर पर कार्य करने के लिए प्रेरित किया.ब्लॉग के पाठकों के लिए प्रस्तुत है इस प्रदर्शनी की एक झलक:


गुरुवार, 6 सितंबर 2012

कैथल की कहानी-खुद कैथल की ज़ुबानी


मै कैथल हूँ... एक बेहद  प्राचीन शहर.. ... ज़र्रे ज़र्रे में तारीख समेटे... मेरे  किसी गांव, तहसील या फिर शहर की पुरानी गलियों में चहलकदमी करिये , आपके कानो में सुदूर अतीत से आती कुछ आवाजें गूंजेगी .... .....दबे पाँव यदि आप हवेलियों के खंडहरों, बावलियों, टूटे फूटे मकबरों ,मजारों, कुइयों, टीलों , किलों ,पोखरों और  मंदिरों में जाएँ  तो वे फुसफुसा कर आपसे कुछ कहना चाहेंगी....अपने समय की बात, अपने पुरखों  की कहानी,जीतों और पराजयों की कहानी, लूट की कहानी, अपने पुरखों की अदम्य मेहनत की कहानी, सूखी धरती  में पानी के स्रोत ढूँढने,खेती की शुरुआत करने ,गाँवों  के बसने और उजड़ने की कहानी,,, पलायन और विस्थापन की कहानी . यहाँ के बाशिंदों से बात करें...हर गाँव के बूढ़े बुजुर्ग को अपने गाँव के बसने की कहानी याद है... उन्होंने सुन रखी है अपने बूढ़े बुजुर्गों से ....यहाँ मौखिक परम्परा बेहद मज़बूत है...आखिर ये  संजय,  महाभारत,पुराणों की सरज़मीं जो है....यहाँ हर जगह आपको मिथक और यथार्थ का संगम देखने को मिलेगा.
कई बार मिथक और यथार्थ ऐसे घुले मिले रहते हैं कि उन्हें अलग करना मुश्किल होता है.,मेरी कहानी कुछ ऎसी ही है... ऋग्वेद के तीसरे मंडल ३/२३/४ और वामन पुराण में कैथल के पास से गुजरती अपाया नदी का जिक्र है. पुराणों में जिन
कथा लोगों का जिक्र है संभवतः वे मेरे ,कैथल के  किठाना या कथायाना गाँव  के लोग थे. इस इलाके में कथा गोत्र के ब्राह्मण काफी संख्या में बसे हैं.पाडिनी के अनुसार  कथासन्हिता”‘ की रचना कपिस्थल गोत्र के ब्राह्मणों द्वारा की गई [निरुक्त४/४}. चौसाला गाँव में च्यवन ऋषि का मंदिर है और उनसे जुडी कथाये बाशिंदों में प्रचलित हैं. वामन पुराण में कपिस्थल में वृद्धकेदार के  मंदिर का उल्लेख है. यही शायद बिगड़ते हुए आज बिद्क्वार हो गया है. कलायत का सम्बन्ध सांख्य दर्शन के प्रणेता कपिल मुनि से माना जाता है
कुरुक्षेत्र से लेकर कैथल  तक का पूरा इलाका महाभारत कालीन मना जाता है  कहते हैं की मुझे युधिष्ठिर ने बसाया था. मिथक के अनुसार कैथल का नाम कपिस्थल से निकला है क्योंकि हनुमान का जन्म कैथल में ही हुआ था...हनुमान की माँ अनजनी के  नाम पर यहाँ अनजनी का टीला है. गाँव खरक पांडवा को पांडवों की छावनी माना जाता है.पुराणों के अनुसार दृष्द्ती नदी के तट पर स्तिथ फल्गु में कृष्ण के सुझाव पर पांडवों ने तप किया था.एक कथा के अनुसार महाभारत युद्ध में हुए भीषण संहार के बाद पांडव अत्यंत विचलित थे.तब कृष्ण के कहने पर उन्होंने नव ग्रहपूजन किया और नौ कुंद बनवाए जो आज भी मौजूद हैं. उन नौ ग्रहों के मंदिर भी हैं जो ग्यारह रुद्री मंदिर के नाम से जाने जाते जाते हैं.ये तो थी मिथक  और यथार्थ की जुगलबंदी.जो सभ्यताएं जितनी पुरानी होतीं हैं वहाँ यथार्थ और मिथक का मिलन भी उतना ही गहरा होता है.

आइये, अब यथार्थ की दुनिया में चलते हैं.अगर हम अतीत की टेढी - मेढ़ी गलियों में भटकना शुरू करें तो वो हमे ले जाएंगी हडप्पा के समय में.जी हाँ, ये पूरा इलाका राखीगढ़ी,बनावली,मिताथल जैसे हडप्पा कालीन बस्तियों से घिरा है.और कैथल के बालू गाँव में हाल फिलहाल खुदाई का काम चल रहा है.
बहुत सारे इलाकों में कुषाण कालीन अवशेष मिले हैं.थेह पोलड में हिंद युनानीं और कुशान काल के सिक्के पाए गए हैं.  हर्षवर्धन के समय में इस इलाके ने भरपूर प्रगति की .चीनी यात्री ह्वेनसांग इस शहर की गलियों-कूचों से गुजरा. पठान, अफगान, सैयद इस सरज़मीं पे बसे. मंगोलों को यहाँ बसाया गया.पट्टी अफगान जैसे गाँवों के नाम आपको सुनने को मिलेंगे. इन सभी की संस्कृतियों , बोलियों, खान- पान, पहनावे,स्थापत्य और अपने बिछुडे  मुल्क की स्मृतियों को ज़िंदा रखने की ख्वाहिश  ने कैथल की संस्कृति में ढेरों  रंग भरे.सैयदों के समय में कैथल ज्ञान और कला का महत्वपूर्ण केन्द्र था .यहाँ तक की प्रसिद्द मध्यकालीन इतिहासकार जलालुद्दीन ने सैयद्कालीन कैथल के विद्वानों की तारीफ़  की है. यहाँ से होकर सुनाम, हांसी, हिसार, सिरसा जैसे सल्तनतकालीन बड़े शहरों को रास्ते जाते थे जिसके कारण मुसाफिरों ,व्यापारियों, भिक्षुओं और धडधडाती फौजों का यहाँ आना और गुजारना होता होगा. हिन्दुस्तान की पहली शासिका रजिया बेगम मध्ययुगीन पुरुषवादी मुल्ला मौलवियों और अपने पुरुष सिपहसालारों से नहीं जीत सकी और कैथल के जंगलों में मारी गई .....नहीं - नहीं ....पितृ सत्ता की बलि चढ गयी. मुग़ल काल में ये शहर एक बड़ी मंडी रहा .शहर की पुरानी गालियाँ उतार -चढ़ाव वाली हैं और कई हिस्से ऊंचाई पर बसे हैं जो इस शहर के बार- बार बसने या पुराने होने का साक्ष्य देते है. इस शहर ने गुर्जर प्रतिहार,  चंदेल, खिलजी ,तुगलक, बलूच, अफगान, मुगलों और सिखों का शासन देखा. १७१९-१७४८ तक मुग़ल बादशाह  मुहम्मद शाह के समय यह एक परगना था.१७३३ में यहाँ की ज़मींदारी एक बलूची उमर-उद्दीन खान के हाथ में आ गयी. १७५६ में बलूच आधिपत्य समाप्त हुआ जब इनायत खान अफगान के हाथ में ज़मींदारी आ गयी .आखिर में १७६७ में भाई देसु सिंह ने कैथल पर कब्ज़ा कर लिया और सिख शासन की नींव डाली. सिख गुरु गुरु हर राय ने देसु सिंह को भगत की उपाधि दी थी. तबसे कैथल के शासक भाई  कहलाये.देसु सिंह ने कैथल का भव्य किला, कैथल के आसपास कई छोटे किले, सरस्वती नदी पर कई कच्चे बाँध बनवाए और मांगना से कैथल तक नहरों से पानी लाने का इंतजाम किया.भाई उड़ाई सिंह ने विद्वानों को संरक्षण दिया. उसमे के महान कवी भाई संतोख सिंह उनके दरबार में थे जिन्होंने नानक प्रकाश , आतम पुराण , गुरु प्रताप सूरज  जैसी किताबें लिखीं और वाल्मीकि रामायण का अनुवाद भी किया.  
 कैथल पर  अल्लाउद्दीन खिलजी और नादिर शाह ने भी हुकूमत की. भारतीय उपमहाद्वीप की अलग अलग जगहों से अलग अलग नस्लों के सुल्तानो के काफिलों में साथ आये आम लोग कैथल में भी बसे.कुछ ने नए गाँव बसाये तो कुछ यहाँ की रिआया के साथ घुलमिल गए.  आज भी मेरे  गाँवों के नाम अपनी कहानी बयान करते हैं....पट्टीअफगान, अहमदपुर, रसूलपुर, खानपुर, फरिआबाद, फिरोजपुर, फतेहपुर, कमालपुर, खेडी सिकंदर, कुतुबपुर, खेडी शेरखान, कोले खान, लंडर कीमा,                          लंडर पीरजादा, पट्टी डोगरा,  सलीमपुर महदूद, वजीरनगर तो दूसरी तरफ रावण हेरा, खरक पांडवा,  रमाना रमानी और  तितरम  जैसे गाँव भी हैं जो हमारी मिथकीय विरासत को समेटे हुए हैं. यहाँ की बसावट में भी एक सांझापन रहा है. अमूमन हर गाँव में इंडो इस्लामिक शैली में बनीं इमारतों के खँडहर मिल जायेंगे तो कलायत में प्रतिहारों का बनवाया भव्य मंदिर.
१८४३ में इस शहर को अंग्रेजों ने हड़प लिया. शासक उदय सिंह की माँ साहब कौर और उनकी विधवा सूरज कौर ने वफादार सिपाही टेक सिंह ने अंग्रेजों को ज़बरदस्त टक्कर दी लेकिन पटियाला रियासत के राजा द्वारा धोखा दिए जाने की वजह से हार गए .टेक सिंह को काला पानी की सजा हुयी. किसानों की भयंकर लूट, दस्तकारी और व्यापार की तबाही , अकाल, और सांझी विरासत और संस्कृति  पर अंग्रेजों के हमले को यहाँ की रिआया ने महसूस किया और फिर अम्बाला से शुरू हुए ग़दर की ज्वाला से कैथल और उसके गांव भी धधक उठे....पाई गाँव में विद्रोहयों को तोपों के मुह पर बाँध कर उड़ा दिया गया...तो फतेहपुर पूंडरी की कमान संभाली गिरधर अहलूवालिया ने जिन्होंने कैथल के सब डिवीजनल अफसर को खत्म कर दिया .वे अंग्रेजों के द्वारा छलनी कर दिए गए. पर कैथल की रिआया ने हार नहीं मानी. १८८३ -१९०१ के बीच उसने पिअरसन  और कैप्टन मैक्नोल की फौजों को कड़ी टक्कर दी.
कैथल की जनता ने आजादी की लड़ाई में बढ़ चढ कर हिस्सेदारी की. पिकेटिंग , हड़ताल ,स्वदेशी, बहिष्कार ,प्रभातफेरी,  असहयोग, खिलाफत ,नमक सत्याग्रह, भारत छोडो,  सभी आन्दोलनों में जनता ने भरपूर हिस्सेदारी की.तिलक के स्वराज फंड में कैथल से ३५०० रूपये इकट्ठा हुए.१९३१ में मौलाना मुहम्मद दीन की अध्यक्षता में कैथल में कांग्रेस का एक बड़ा जलसा हुआ.लोगों को जलसे में आने से रोकने के लिए भारी धर-पकड़ की गई.२६ जनवरी१९३१ को जगह -जगह तिरंगे फहराए गए. आजादी का जश्न भी यहाँ जम के मनाया गया....तो तकसीम में उजड़े रिफ्यूजियोंको जगह भी दी गई .   
ये तो थी कैथल की एक छोटी सी झांकी.हज़ारों साल पुराने एक शहर की कहानी क्या महज़ चंद सफों /लफ़्ज़ों में बयान हो सकती है?हम तो इस छोटी सी कहानी के बहाने से ये  बताना चाह रहे थे कि कोई भी मुल्क, सूबा, शहर या गाँव किसी एक कौम या मज़हब का नही होता...इतिहास ऐसा होने  ही नहीं देता .क्योंकि इतिहास ने खुद में समेट रखें हैं बहुतेरे  रंग. इसके हर पन्ने पे अलग अलग कौमों, मजहबों, बोलियों, तौर तरीकों ,रवायतों के घुलने - मिलने की कहानी है  .कैथल की ज़मीन ने, कैथल के बाशिंदों ने, कैथल के इतिहास ने, सदियों से सभी को जगह दी है.यहाँ नीम साहब गुरद्वारा है जहां सिखों के नौवें गुरु तेग बहादुर आये. सभी मज़हब के के लोग यहाँ आते हैं.गुरुद्वारा मंजी साहब की कहानी भी गुरू तेग बहादुर से जुडी है. कहते है  गुरु एक बढई और एक बनिया के घर गए और उन्हें आशीर्वाद दिया.बढई ने यह जगह गुरद्वारे के लिए दे दी.   आजादी के पहले शीतला मंदिर में मुस्लिम जोगी पूजा करते थे. कैथल हमेशा से सूफी संतों का शहर रहा...शेख कमाल बाबा कादरी, शेख शहाबुद्दीन शाह विलायत,शेख तैयब, समध सितलपुरी जैसे सूफी संतों ने गंगा जामुनी संस्कृति के बनने में मदद की. शहर की सबसे अज़ीम जगह सूफी संत हजरत शाह बाबा कमाल कादरी और उनके पोते सिकंदर कादरी की मज़ार है जो यहाँ ९२८ हिजरा {१६ वीं सदी }में बग़दाद से कादरी सिलसिले की शिक्षा देने आये थे.तब कैथल धर्म और दर्शन का केन्द्र बना. आज यहाँ सभी धर्म के लोग जियारत के लिए आते हैं. पादशाही गुरुदारा भी अपने में एक कहानी समेटे हुए है. टोपिया गुरुद्वारा में रामायण का पाठ होता है. कैथल की संस्कृति को एक अलग रंग दिया है तकसीम के समय आये रिफ्यूजियों ने. जाट सरदार और मुल्तान, लाहौर, झंग जैसी जगहों से उजड कर आये लोगों की पहली पीढ़ी अभी ज़िंदा है. वक्त की लकीरें चेहरे पर  बयान करती किसी बुज़ुर्ग को कुरेदिये, उसकी आँखे टंग जाएंगी कहीं  दूर, बहुत दूर, बचपन में गुज़ारे गए किसी मकान पे,किन्ही गलियों और बाज़ारों पे , किसी स्कूल पे या किसी लाला की दूकान पे.और बात करिये.... अब उनकी आँखें नम हो जाएंगी और एक अजीब किस्म की कसमसाहट , एक गहरी छटपटाहट उनपे छ जायेगी. बंटवारे की पीड़ा,अपनी पुरखों की ज़मीन से उजडने, अपनों को खो देने, अपनों मारे  जाने की पीड़ा सीने में जज़्ब किये उसने इस शहर में अपनी मेहनत से जगह बनाई है. उसने शहर को एक बेलौस चमक दी है.उनकी वजह से शहर की हवाओं में एक अजीब सी खुशी और उल्लास तारी रहती है.
आज मै लगातार फ़ैल रहा हूँ .आस पास के गाँवों के लोग नौकरी, पढ़ाई,और छोटे मोटे काम की तलाश में यहाँ आकर बस रहे हैं. देश की बिगड़ती राजनीती और धार्मिक उन्माद का असर मैंने भी महसूस किया हैं. मेरा दिल जार जार रोता है. जिसकी फिजाओं में बुल्ले शाह , बाबा फरीद, नानक के  बोल और शब्द  गूंजते रहे हों, जिसकी तहजीब को बाबा कमाल शाह, शेख तैयब, गुरु तेग बहादुर ने सींचा हो, जिसने हडप्पा के समय से सांझी विरासत का जश्न मनाया हो, जहां दुनिया का सबसे बेहतरीन महाकाव्य रचा गया हो . उसपर आज आंच आने लगी है. जाति, मज़हब के मसलों पर तलवारें खिंचने लगी हैं..मेरे ऊपर खून के छीटें  पड़े हैं. इज्ज़त के नाम पे औरतों और लड़कियों  के साथ होने वाली घटनाओं से मेरा सिर शर्म से झुक जाता है.
नयी  पीढ़ी सुंदर  अतीत को भूलती जा रही है. उसे कौन याद दिलाएगा?कौन परिचित कराएगा? अब वक्त आ गया है जब हमे मिल कर सोचना चाहिये.इस शहर को रंग बिरंगे फूलों का बागीचा बने रहने देना चाहिए.....ताकि सांझी विरासत का जश्न चलता रहे ...मनता रहे .