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सोमवार, 14 जनवरी 2013

Goa Folk Festival

                         गोवा लोक संस्कृति महोत्सव
                              Goa Folk Festival
                               (21 जनवरी,2013)
                             
                                     




























"संभव" और मल्टी-कल्चरल आर्ट सेंटर, कुरुक्षेत्र के तत्वावधान में आल्योजित "गोवा लोक संस्कृति महोत्सव" में आप सभी आमंत्रित हैं...आशा है आप सभी कार्यक्रम का प्रचार करेंगे और अपने मित्रों और परिवार के साथ   इस कार्यक्रम को सफल बनायेंगे....

स्थान: आर.के.एस.डी.कालेज
समय : शाम सुहानी ( समय जल्दी ही पक्का हो जायेगा)  

रविवार, 30 दिसंबर 2012

मानव गरिमा की मौत




दामिनी की मौत ने सबको विचलित कर दिया ,लेकिन उसने हम सब के सामने कुछ गंभीर प्रश्न भी खड़े कर दिए.कल कैथल के जाट ग्राउंड से जवाहर पार्क तक एक मौन  या यूं कहें की रोष जुलूस निकला जिसमें तमाम  संगठनों और शहर के सोचने-समझने वाले लोग शामिल हुए. आज तितरम गाँव में और तितरम मोड़ पर एक सभा हुई और एक परचा बांटा गया .पर्चा प्रस्तुत है आपके लिए. सोचें, बांटे और समाज को बदलने का प्रयास करें...

इस समाज को लड़कियों के रहने लायक बनाओ

एक लडकी मर गयी..!
तो क्या हुआ...?
रोज़ लड़कियां मरती हैं. ..!!
नहीं, हम उस लडकी की बात कर रहें हैं जो 16 दिसम्बर की रात को हैवानियत का शिकार हुयी. यह वह लड़की थी जिसे देश की राजधानी दिल्ली में छ: वहशी लोगों के द्वारा रौंद डाला गया.
आप सब पिछले 12-14 दिनों से सुन पढ़ रहे होंगे कि एक लड़की पहले दिल्ली और फिर सिंगापुर के एक अस्पताल में ज़िन्दगी और मौत के बीच झूल रही थी और आखिरकार 28-29 दिसम्बर की रात को उसने दम तोड़ दिया. मीडिया के माध्यम से हम इस लड़की को दामिनी के नाम से जानते है. जो कुछ दामिनी ने झेला उसके समक्ष बलात्कार शब्द बहुत छोटा पड़ जाता है.
  दामिनी पहली लड़की नहीं थी, और दामिनी आखिरी लड़की भी नहीं है. न जाने
कितनी दामिनियाँ रोज़ लुटती-पिटती दम तोड़ देती हैं.
 पिछले कुछ अरसे से अख़बारों में रेप और गैंग रेप की घटनाएँ हम लगातार पढ़ रहे हैं. लोगों में आक्रोश है, गुस्सा है, शर्म है...प्रशासन और पुलिस से शिकायत है.
   लेकिन क्या यह सिर्फ क़ानून व्यवस्था का मामला है? क्या सिर्फ सख्त कानून भर बना देने से ये समस्या हल हो जाएगी?
   क्या हमारे सामाजिक ढाँचे का इसमें कोई दोष नहीं है?
   क्या बचपन से लड़की-लड़के में भेदभाव इसका कारण नहीं है?
   क्या औरत को एक सामान्य इंसान और नागरिक ना समझना इसका कारण नहीं है?
   क्या पुरुषवादी मानसिकता और व्यवहार इसके कारण नहीं हैं?
   क्या परम्पराएं इसका कारण नहीं हैं?
   क्या बिगड़ता लिंगानुपात इसका कारण नहीं?
   क्या बढती बेरोज़गारी और नौजवानों का बढ़ता उद्देश्यहीन जीवन इसका कारण नहीं?
   क्या फूहड़ फ़िल्में और गाने इसका कारण नहीं?
 अगर हम इन सवालों के उत्तर नहीं खोजेंगे तो दामिनियों की अस्मत लुटती रहेगी...दामिनियाँ मरती रहेंगीं.अब वक़्त आ गया है कि हम इन सवालों पर गौर करें क्योंकि दामिनियाँ हमारे घर में ही हैं,हमारे पड़ोस में भी हैं..
 आइये, इस समाज को दामिनियों के रहने लायक बनाएं, ताकि इसे एक सभ्य और सुन्दर समाज कहा जा सके.  
      संभव ( SOCIAL ACTION FOR MOBILISATION & BETTERMENT OF HUMAN THROUGH AUDIO-VISUALS) द्वारा जारी

फोन:9813272061, 9729486502, 9416203045


मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

सुनिए फरहत साहब की आवाज़


फरहत शहजाद की शायरी और मेहंदी साहब की मौसिकी दोनों के मिलन ने अदब और तहजीब को एक अलग ही ऊंचाई तक पहुंचाया .पेश है आपके लिए चाँद गज़लें...


                                  तुम्हारे साथ भी तनहा हूँ....
              {सुनने के लिए विडिओ के बीच में बने तीर के निशाँ को क्लिक करें}

गुरुवार, 1 नवंबर 2012


                              सरस मेला ....कैथल की कहानी और  "सम्भव" की प्रदर्शन

  ज़िंदगी एक मेला है  और मेला ज़िन्दगी .मेलों के बिना ज़िंदगी अधूरी है और मेले ज़िंदगी की रवानी को बनाए रखते हैं.....सदियों से चले आ रहें हैं मेले. ज़िंदगी की जद्दोजहद के बीच मेल-मिलाप, घूमने - फिरने, खाने - पीने ,रौनक देखने, कला के हुनर देखने, खरीद-फरोख्त , किसिम-किसिम के करतब देखने और न जाने क्या-क्या के लिए लगते रहें हैं मेले...
       आजकल कैथल में लगा "सरस मेला" भी लोगों को अपनी ओर खींच रहा है. जगह-जगह से आये शिल्पकार और उनके बेहतरीन सामानों को खरीदने वालों की जहां भीड़ लगी है तो वहीं  शाम को अलग -अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम एक अलग ही समां बांधते हैं. लेकिन इन सबके बीच जो जगह सबसे ज़्यादा लोगों को खींच रही है वह है 'संभव" सामाजिक और सांस्कृतिक संस्था द्वारा लगाई गई प्रदर्शनी- "मैं कैथल हूँ ". कैथल के पौराणिक महत्त्व के स्रोतों को बताती कैथल की कहानी ले जाती है हमें सुदूर अतीत में ..... हड़प्पा काल की बस्ती में हुई खुदाई में मिले  पुरातात्विक स्रोतों को प्रस्तुत करती,  कलायत के प्रतिहार राजाओं के भव्य मंदिर को दर्शाती , रजिया के मज़ार की सैर कराती  यह प्रदर्शनी अट्ठारह सौ सत्तावन में कैथल शहर और आस-पास के गाँवों में धधकी ज्वाला का बयान करते स्वतंत्रता आन्दोलन में कैथल की भूमिका और कैथल में गांधी जी के आगमन का ज़िक्र करती है.. यह विभाजन की पीड़ा को भी बताती है...आज़ादी के बाद यहाँ हुए विकास और विडंबनाओं की चर्चा करते हुए अतीत के सांझेपन को बरकरार रखने की  अपील के साथ यह प्रदर्शनी  सामाजिक बदलाव के लिए सबको अपनी भूमिका निभाने का आह्वान करती है ...  
      प्रस्तुत है प्रदर्शनी और मेले की एक झलक..

अपने शहर..अपने अतीत में खुद को तलाशते लोग 

         
             
        प्रदर्शनी में लोग--कैथल की विरासत को देखते और महसूस करते...        



सांझी विरासत....
दो पीढियां ....कैथल को समझने की कोशिश में....
नन्हीं बेतिया...इतिहास को समझने की कोशिश में.....





अरे, ये क्या है??

मेले में........जादू........


















यह मात्र झलक थी..... हम मिलते रहेंगे.....मेले के और भी रंगों के साथ.....

सोमवार, 22 अक्टूबर 2012

हज़ारों सालों से "लोक" में बसा फल्गु मेला ..



                  पिछले दिनों गुजरा फल्गु मेला हज़ारों सालों से  कैथल की संस्कृति , इतिहास और लोकजीवन का हिस्सा रहा है. मेलों के बिना  क्या हम किसी समाज की कल्पना कर सकते हैं? इंसान ने जीवन के साथ अपने संघर्ष में हमेशा जीवन को सुन्दर बनाने की कोशिश की है....मेले ज़िंदगी को खूबसूरत बनाते रहें हैं. ज्यादातर मेलों के पीछे कोई धार्मिक कहानी भले ही रही है , लेकिन वास्तविकता यह है कि मेले जी - तोड़ मेहनत के बाद अपने बाल-बच्चों और परिवार के साथ घर से बाहर निकल कर पूरे समुदाय के साथ मौज- मस्ती और खुशियाँ मनाने का एक बहाना भी रहा है. भोजपुरी के महान  लोककवि  और गीतकार  कैलाश गौतम की लोकप्रिय कविता "अमौसा के मेला" (अमावस्या का मेला) की कुछ पंक्तियाँ आपके लिए प्रस्तुत हैं जो  यहाँ बेहद मौजूं है...

................................................
 भक्ति के रंग में रंगल गाँव देखा,
धरम में, करम में, सनल गाँव देखा.
अगल में, बगल में,सगल गाँव देखा, 
अमौसा नहाए चलल गाँव देखा.
.......
  फल्गु मेले का इस पूरे इलाके में बहुत ज़्यादा महत्व रहा है.  इस इलाके के लोग तो यहाँ पितरों की पूजा और दान के लिए आते ही हैं, ऐसे लोग जो कई पीढी पहले कैथल से किसी दूसरी जगह जाकर बस गए, वे भी यहाँ अवश्य आते हैं.
      "कैथलनामा" टीम ने भी फल्गु मेले का आनंद उठाया. अदभुत नज़ारा था. पंजाब से लेकर राजस्थान तक के लोग हज़ारों लोग, बड़े - बूढ़े,  औरतें  और बच्चों का सैलाब... सारा इलाका  कोलाहल में डूबा, धर्म जाति के बंधनों को तोड़ता ...जीवन का भरपूर आनंद उठाता...
   कुछ खुशनुमा पलों को हमने कैमरे  में कैद किया. प्रस्तुत है आपके लिए एक एल्बम..




 इसे कहते हैं जिजीविषा.... राजस्थान से आयीं दादी ...

                             
                                 

खजाला.... यू.पी. में इसे खाजा कहते हैं. अब मेलों में ही दिखता है. मेले वास्तव में संस्कृति को कितना बचा कर रखते है... और संस्कृति को कौन बचाए रखता है?? आम लोग...सदियों से संस्कृति आम लोगों के कारण ही बची रही 




एक दूसरे को संभालती ...दो पीढियां ....चली मेला देखन को...




झूले... इनके बिना मेला पूरा नहीं होता...दिल थाम कर बैठते हैं लोग इस पर...देसी टेक्नोलोजी, देसी हुनर... 
 
उदास क्यों है बच्चा...वो भी मेले में ??







 पितरों को याद करते.


प्लास्टिक के खिलौनों ने मिट्टी के खिलौनों की जगह ले ली है...फिर भी खिलौने, खिलौने हैं ...बच्चों के लिए ज़रूरी. इस बच्चे को भी खिलौने से खेलने की फुर्सत मिलती होगी क्या ?
नट-नटी..यह संतुलन बनाने में कितनी मेहनत छिपी है...जिसकी कोई कद्र नहीं...इन्हें कोई संभाल ले तो ये सोना ले आयें ओलम्पिक में...

जलेबा...

और अंत में मौत का कुआं ...जीवन के लिए मौत का कुआं....

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

पंजाब का गांव 1925 में - छोटी सी फिल्म

1925 में बनी यह एक मूक और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म है. हालाँकि इसे ब्रिटिश इंस्ट्रक्शनल सीरीज के तहत अंग्रेज फिल्मकारों ने अपने दर्शकों को दिखाने के लिए बनाया था. इस फिल्म में उस दौर के पंजाब की एक झलक है. रहट, कोल्हू और हल को देखना तो आज की पीढ़ी के लिए एक अजूबे की तरह है. 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

बाबा तोतापुरी : कैथल का अद्वैत दार्शनिक और रामकृष्ण परमहंस का गुरु,

 
      

हरियाणा और  कैथल  शिक्षा, ज्ञान और दर्शन का विशेष केन्द्र रहें हैं. लोगों को यह यकीन नहीं होगा कि कैथल के बाबा लदाना गाँव में उन्नीसवीं  सदी में एक ऐसा दार्शनिक पैदा हुआ जिसके बारे में  बीसवीं सदी में  विश्व  के महानतम  दार्शिनिकों  में से एक , रोमा रोलां  ने बड़े सम्मान के साथ अपने विचार रखे . यह दार्शनिक थे बाबा लदाना के तोतपुरी . वे अद्वैत  दर्शन के महानिर्वाणी अखाड़े के  नागा पंथ से ताल्लुक रखते थे. उन्होंने लदाना के ही बाबा राजपुरी मठ से शिक्षा पाई थी. 1858 में वे डेरा के मुखिया बने .  भौतिक जगत और माया  को नकार कर वे अंतिम सत्य  की खोज में लगे थे.  अपने प्रश्नों के उत्तर तलाशते उन्होंने वस्त्र भी त्याग दिए जिससे जन के बीच वे नंगता बाबा के नाम से जाने गए. 1861 में सत्य की खोज में  यायावरी करते वे मठ से  निकल पड़े . शास्त्रार्थ करते वे कलकत्ता पहुंचे जहां 1864 में  उनकी  मुलाक़ात सत्य को तलाशते एक और  बेचैन संत  से हुई . वे थे  स्वामी विवेकानंद  के गुरु राम कृष्ण परमहंस .  रोमा रोलां ने कहा है कि  इस मुलाकात ने राम कृष्ण की दार्शनिक सोच को आकार देने में और  जीवन की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की . बाबा तोतापुरी ने  काली की भक्ति में  आसक्त राम कृष्ण को अद्वैत दर्शन के अपने प्रश्नों से झिंझोड़ कर रख दिया. साकार ब्रह्म और काली की भक्ति से वे ध्यान नही हटा पा रहे थे . बाबा तोतापुरी ने परमहंस को द्वैत का रास्ता छोड़ अद्वैत का रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित किया. आत्मसाधना और चिंतन के बाद  उन्होंने अद्वैत दर्शन को अपनाया . वे तोतापुरी के शिष्य बन गए. आध्यात्मिक इतिहास में गुरु और शिष्य की यह मुलाक़ात  अनोखी मानी जाती है क्योंकि जहां शिष्य ने गुरु से अद्वैत दर्शन सीखा तो  गुरु ने अपने  शिष्य से अटूट भक्ति सीखी. दोनों ने परस्पर एक दूसरे से सीखा तो एक दूसरे को दिया भी.
    इस घटना से यह तो साबित होता ही है कि कैथल शहर और इसके आसपास का इलाका एक समय में ज्ञान  और दर्शन के क्षेत्र में बेहद उन्नत था. और यह सब तभी संभव हो पाया क्योंकि कैथल सदियों से  शिक्षा , ज्ञान , दर्शन और संस्कृति का केन्द्र रहा है. यही हमारी धरोहर और विरासत है. हमें इसे जानना है और समझना है  और इसे  संजो कर रखना है.

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

ऐ हुस्न हकीकी - नूर - ए - असल


              ऐ हुस्न हकीकी - नूर - ए - असल
                                      ---अरीब अजहर   
 कौन कहता है कि हिन्दुस्तानी उपमहाद्वीप से गंगा जामुनी तहजीब खत्म हो  गई है... पाकिस्तान के नागमानिगार और गायक अरीब अजहर गाते हैं
            ऐ हुस्न - हकीकी नूर असल
            तनु बादल बरखा  दाज  कहूँ
            तनु आब कहूँ तनु ख़ाक कहूँ
            तनु दसरत लिछमन राम कहूँ
            तनु किसन कन्हैया कान कहूँ
            तनु ब्रह्मा किशन गणेश  कहूँ  
            महादेव कहूँ भगवान कहूँ
            तनु नूह कहूँ तूफ़ान कहूँ  
            तनु  इब्राहिम खलील कहूँ
            तनु मूसा बिन इमरान कहूँ  
            तनु सुर्खी बीड़ा पान कहूँ
            तनु तबला तय तम्बूर कहूँ
            तनु  ढोलक सुर तय  तान कहूँ

    यह गीत, यह शायरी हिंदू की है या  मुसलमान की ? यह शायरी हिन्दुस्तान की है या  पाकिस्तान की? इसे हम कैसे बाँट सकते हैं ? यहाँ तो कृष्ण - कन्हैया , मूसा, इब्राहिम से लेकर गीत - संगीत और सबसे बड़ी बात मिली जुली तहजीब में रचा-पगा इंसान तक सांझा है .  भक्ति, सूफी , इश्क , मोहब्बत में डूबा , अल्लाह, मूसा, राम और कन्हैया से गुफ्तगू  करता,  अनहद की ऊंचाइयों तक पहुंचाता पेश है  अरीब अजहर  का यह नगमा कैथलनामा की ओर से ---   
( सौजन्य : कोक स्टूडियो )
  

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

फरहत शहजाद का कैथल

सिरजन की आखिरी शाम को संस्कृतिकर्मी मित्र एवं वर्तमान में अतिरिक्त उपायुक्त, कैथल दिनेश सिंह यादव ने अपने कुछ संस्मरण साँझे किये. जाने-माने शायर फरहत शहजाद के पूर्वज मूलतः कैथल से थे और विभाजन के समय उनका परिवार पाकिस्तान चला गया था. कुछ साल पहले फरहत अपने सखा दिनेश के साथ अपने पुरखों की मिट्टी को सजदा करने आये थे. जब दिनेश ने फरहत से पूछा कि आपको यहाँ आकर कैसा लग रहा है तो फरहत का जवाब था कि मुझे ऐसा लग रहा है मानों मैंने अपने अब्बू को हज करा दिया है. उल्लेखनीय है कि फरहत शहजाद की शायरी को मेहंदी हसन सहित कई कलाकारों ने अपनी आवाज दी है. हाल ही में हुई एक बातचीत में फरहत ने बताया कि जैसे ही मौका मिला वे एक बार फिर इस शहर में आना चाहेंगे. कैथल को फरहत की प्रतीक्षा है. सुनिए दिनेश सिंह यादव के संस्मरण और थोड़ी सी शायरी...

शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

शहर को मिलेगा ओपन एयर थियेटर

दिनांक 07-09-2012 के अमर उजाला के स्थानीय संस्करण की खबर के अनुसार कैथल शहर को सरकार एवं प्रशासन की ओर से ओपन एयर थियेटर की सौगात मिलने वाली है. खबर में आगे कहा गया है कि यह जगह शहर में राजनीतिक और सामजिक सभाओं के लिए भी उपयुक्त रहेगी. यकीनन कैथल में इस तरह के खुले सार्वजनिक क्षेत्र का नितांत अभाव है. 'वास्तव मे शहर के लिए यह एक अच्छी खबर है. किसी भी शहर की जीवन्तता के लिए एक सांस्कृतिक केन्द्र का होना प्राणवायु की तरह आवश्यक है. भौतिक विकास के साथ उसी गति से सांस्कृतिक विकास ना हो तो समाज में विशेष तरह की विकृतियां आ जाती हैं, 'संभव'एवं शहर के अन्य संस्कृतिकर्मियों ने कैथल में अपनी सांस्कृतिक मुहिम के दौरान कई बार इस ख़ालीपन को महसूस किया है. प्रशासन की पहल अत्यंत प्रशंसाजनक है. उम्मीद है कि यह केन्द्र महज राजनीतिक एवं सरकारी सभाओं के आयोजन का केन्द्र न बनकर सही अर्थों में एक वास्तविक सांस्कृतिक एवं सामुदायिक केन्द्र के रूप में उभरेगा.'