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मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

सुनिए फरहत साहब की आवाज़


फरहत शहजाद की शायरी और मेहंदी साहब की मौसिकी दोनों के मिलन ने अदब और तहजीब को एक अलग ही ऊंचाई तक पहुंचाया .पेश है आपके लिए चाँद गज़लें...


                                  तुम्हारे साथ भी तनहा हूँ....
              {सुनने के लिए विडिओ के बीच में बने तीर के निशाँ को क्लिक करें}

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

पंजाब का गांव 1925 में - छोटी सी फिल्म

1925 में बनी यह एक मूक और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म है. हालाँकि इसे ब्रिटिश इंस्ट्रक्शनल सीरीज के तहत अंग्रेज फिल्मकारों ने अपने दर्शकों को दिखाने के लिए बनाया था. इस फिल्म में उस दौर के पंजाब की एक झलक है. रहट, कोल्हू और हल को देखना तो आज की पीढ़ी के लिए एक अजूबे की तरह है. 

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

ऐ हुस्न हकीकी - नूर - ए - असल


              ऐ हुस्न हकीकी - नूर - ए - असल
                                      ---अरीब अजहर   
 कौन कहता है कि हिन्दुस्तानी उपमहाद्वीप से गंगा जामुनी तहजीब खत्म हो  गई है... पाकिस्तान के नागमानिगार और गायक अरीब अजहर गाते हैं
            ऐ हुस्न - हकीकी नूर असल
            तनु बादल बरखा  दाज  कहूँ
            तनु आब कहूँ तनु ख़ाक कहूँ
            तनु दसरत लिछमन राम कहूँ
            तनु किसन कन्हैया कान कहूँ
            तनु ब्रह्मा किशन गणेश  कहूँ  
            महादेव कहूँ भगवान कहूँ
            तनु नूह कहूँ तूफ़ान कहूँ  
            तनु  इब्राहिम खलील कहूँ
            तनु मूसा बिन इमरान कहूँ  
            तनु सुर्खी बीड़ा पान कहूँ
            तनु तबला तय तम्बूर कहूँ
            तनु  ढोलक सुर तय  तान कहूँ

    यह गीत, यह शायरी हिंदू की है या  मुसलमान की ? यह शायरी हिन्दुस्तान की है या  पाकिस्तान की? इसे हम कैसे बाँट सकते हैं ? यहाँ तो कृष्ण - कन्हैया , मूसा, इब्राहिम से लेकर गीत - संगीत और सबसे बड़ी बात मिली जुली तहजीब में रचा-पगा इंसान तक सांझा है .  भक्ति, सूफी , इश्क , मोहब्बत में डूबा , अल्लाह, मूसा, राम और कन्हैया से गुफ्तगू  करता,  अनहद की ऊंचाइयों तक पहुंचाता पेश है  अरीब अजहर  का यह नगमा कैथलनामा की ओर से ---   
( सौजन्य : कोक स्टूडियो )
  

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

कितने कैथल ?

कैथल सिर्फ किसी एक भौगोलिक इकाई का नाम नहीं है. दुनिया में जगह-जगह कैथल हैं और हर कैथल में जगह-जगह अलग दुनिया है. हर कैथल की पीड़ा सांझी है. हर पीड़ा का कैथल साँझा है. सियासतें, घटनाएँ और तारीख लोगों को उजाड़ कर भले ही एक जगह से दूसरी जगह पर धकेल दें पर लोगों की यादों, तहजीब, खान-पान, रवायतों और बोलियों को क्या कभी वे बदल पाएं हैं? कागज पर नक्शा खींच कर सरहद के ‘इधर’ और ‘उधर’ पहुंचा दिए गए लोग जिस मिट्टी में पले-बढे हों और वहीं-कहीं तोतली जबान को बोलते हुए भाषा सीखी हो, जहाँ का गीत-संगीत, मुहावरे, गालियाँ और..और भी न जाने क्या-क्या अपने खून में रचाया बसाया हो उस मिट्टी की महक को भला कौन सियासत मिटा सकी है, मिटा पायेगी? सपनो, खुशियों और स्यापों के साये मजबूती से उनका दामन पकड़े साथ-साथ चलते हैं ताउम्र.... तकसीम के समय गहरी पीड़ा, आंसूओं और छलनी हो चुके दिलों के साथ लाखों लोग इधर से उधर या उधर से इधर भेज दिए गए लेकिन उनकी माँ बोली उनके साथ बनी रही. अपनी जुबान, तहजीब और अपनी मिट्टी की यादों को संजो कर रखने वाले लोग सरहद के दोनों ओर हैं. ऐसे ही लोगों से तहजीब बची रहती ओर बिखरती जाती है ओर आने वाली पीढियां उसे थामे रहती हैं. तकसीम के वक्त हरियाणा से पाकिस्तान गए लोंगो ने आज भी अपनी मा.बोली हरियाणवी को जिन्दा रखा है और इधर राणा प्रताप गन्नौरी जैसी शख्सियतों ने अपनी माँ-बोली मुलतानी में ढेरों नज्में लिख कर अपनी मिट्टी की महक को जिंदा रखा है. सांझी विरासत की ऐसी मिसालों से ही अमन की मशालें रोशन हैं. देखिये ये दोनों वीडियो...

बुधवार, 12 सितंबर 2012

हरियाणवी वाद्य-वृन्द

धरती का कोई भी आबाद इलाका ऐसा नही होगा जहां लोगों ने खूबसूरत संस्कृति को जन्म न दिया हो. हज़ारों सालों में “लोक” ने गीत – संगीत, कला - चित्रकला , नाटक – नौटंकी - सांग मुहावरों, लोकोक्तियों , किस्से-कहानियों या फिर त्योहारों को जन्म दिया है. हरियाणा की भी अपनी खेतिहर ज़मीन से उपजी समृद्ध संस्कृति और परम्परा रही है, पर “सांस्कृतिक एलीट” ने हमेशा यह कहा कि There is only one culture in Haryana and that is Agriculture. हरियाणा के एक शख्स पिछले पच्चीस सालों से इस सोच को गलत साबित करने के अभियान में लगे हैं. जी हाँ, वह शख्सियत हैं अनूप लाठर. अनूप लाठर हरियाणा के लिए कोई अनजान व्यक्ति नहीं हैं. हरियाणा में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की ज़रूरत को महसूस करते हुए उन्होंने 1985 में “रत्नावली” नाम से कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में एक सालाना लोक सांस्कृतिक जलसा शुरू किया . मात्र दो लोक विधाओं के आयोजन से शुरू हुए इस जलसे में प्रस्तुत विधाओं की संख्या आज बढ़ कर पच्चीस हो गयी है और यह सबसे ज्यादा इंतज़ार किये जाना वाला सांस्कृतिक उत्सव बन चुका है. कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा और सांस्कृतिक विभाग में अध्यक्ष श्री लाठर के प्रयास से लोकप्रिय लोक शैलियों का तो रत्नावली महोत्सव में आयोजन होता ही रहा है, लुप्त होने की कगार पर पहुँच चुकी सांस्कृतिक शैलियों को पुनर्जीवित कर अधिक महत्वपूर्ण काम किया गया. उनका सबसे बड़ा योगदान यह है कि उन्होंने इन शैलियों को उस युवा पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बना दिया जो अक्सर फिल्मी संस्कृति के पीछे भागती है . रत्नावली महोत्सव में शामिल होने के लिए तमाम कलाकार साल भर अपनी कला को मांजते हैं. इसे सीखने के लिए वे पारंगत बुजुर्ग कलाकारों के शागिर्द बनते हैं. इस तरह दोनों पीढियां वास्तव में मिल के हरियाणा की लोक संस्कृति को बचा रहीं हैं जिन्हें श्री लाठर का नेतृत्व प्राप्त है. कैथल में बलजीत सिंह और उनकी टोली अनूप लाठर के काम को आगे बढ़ा रही है.आर.के.एस.डी. कॉलेज की ऑर्केस्ट्रा टीम एक बेहतरीन टीम है जो विभिन्न हरियाणवी साजों को बजाने में माहिर हैं. घड्वा ,ढफ, मंजीरा, ढोलक, एकतारा, दोतारा, नगाड़ा, बैंजो, ताशा , चिमटा जैसे साजों को जब यह मंडली समवेत स्वर में बजाती है तो एक अलग ही समां बन जाता है. पढ़े - लिखे नौजवानों को लोक साज़ बजाते देख दिल को एक सुकून भी मिलता है कि अनूप लाठर जी का प्रयास बेकार नहीं जा रहा है. प्रस्तुत है अनूप लाठर द्वारा निर्देशित हरियाणवी वाद्य-वृन्द की बेजोड़ प्रस्तुति: हरियाणा की लोक संस्कृति को नौजवान पीढ़ी ज़रूर बचा लेगी. अनूप लाठर को सलाम करते हुए आपके लिए प्रस्तुत है हरियाणवी वाद्य वृन्द जो रत्नावली महोत्सव के लिए अनूप लाठर के निर्देशन में तैयार किया गया :

मंगलवार, 11 सितंबर 2012

फरहत शहजाद का कैथल

सिरजन की आखिरी शाम को संस्कृतिकर्मी मित्र एवं वर्तमान में अतिरिक्त उपायुक्त, कैथल दिनेश सिंह यादव ने अपने कुछ संस्मरण साँझे किये. जाने-माने शायर फरहत शहजाद के पूर्वज मूलतः कैथल से थे और विभाजन के समय उनका परिवार पाकिस्तान चला गया था. कुछ साल पहले फरहत अपने सखा दिनेश के साथ अपने पुरखों की मिट्टी को सजदा करने आये थे. जब दिनेश ने फरहत से पूछा कि आपको यहाँ आकर कैसा लग रहा है तो फरहत का जवाब था कि मुझे ऐसा लग रहा है मानों मैंने अपने अब्बू को हज करा दिया है. उल्लेखनीय है कि फरहत शहजाद की शायरी को मेहंदी हसन सहित कई कलाकारों ने अपनी आवाज दी है. हाल ही में हुई एक बातचीत में फरहत ने बताया कि जैसे ही मौका मिला वे एक बार फिर इस शहर में आना चाहेंगे. कैथल को फरहत की प्रतीक्षा है. सुनिए दिनेश सिंह यादव के संस्मरण और थोड़ी सी शायरी...

शनिवार, 8 सितंबर 2012

सांझी विरासत पर प्रदर्शनी

पिछले दिनों कैथल में 'सम्भव'द्वारा कैथल की सांझी विरासत पर एक भव्य फोटो प्रदर्शनी का आयोजन किया गया था. शहर के और दूर-दराज से आए सैकड़ों लोगों ने सम्भव के इस प्रयास को सराहा. इस प्रदर्शनी के आयोजन में सम्भव कार्यसमिति की मुख्य सदस्य डा.आशु वर्मा ने,जो स्वयं इतिहास की अध्यापिका हैं विशेष भूमिका निभाई थी. रामफल, संतरो, सत्यवान, गुरप्रीत, सोनिया,सुरेन्द्रपाल,विक्रम व् सम्भव के अन्य कई कार्यकर्ताओं ने इस प्रदर्शनी के संजोने में विशेष सहयोग किया था. शहर के संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और मीडियाकर्मियों का भी इस प्रदर्शनी के सफल आयोजन में विशेष योगदान दिया. प्रदर्शनी में आए स्थानीय नागरिकों ने कैथल के इतिहास और संस्कृति के बारे में टीम को कई महत्वपूर्ण जानकारियां दीं थी. शहरवासियों के इस उत्साहवर्धन ने सम्भव को स्थानीय इतिहास और संस्कृति पर दीर्घकालिक प्रोजेक्ट के तौर पर कार्य करने के लिए प्रेरित किया.ब्लॉग के पाठकों के लिए प्रस्तुत है इस प्रदर्शनी की एक झलक: