कैथलनामा 'सम्भव' द्वारा संचालित साँझा मंच है. कैथल को सन्दर्भ में रखकर स्थानीय एवं मौखिक इतिहास,सांझी संस्कृति और साहित्य पर व्यापक विमर्श का यह एक छोटा सा प्रयास है.साथ ही हमारी कोशिश रहेगी कि आम नागरिकों की समस्याओं के समाधान की दिशा में कुछ सार्थक प्रयास भी कियें जाएँ.बुद्धिजीवियो,सामाजिक कार्यकर्ताओं, शिक्षाविदों, मीडियाकर्मियों,विद्यार्थियों और जागरूक नागरिकों के सहयोग से इस अभियान को सफल बनाया जा सकता है..ऐसी हमारी उम्मीद है.
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बुधवार, 26 सितंबर 2012
किस्सा भगत सिंह-(ऑडियो)-हरियाणवी-भाग चार (अंतिम)
प्रस्तुत है भगत सिंह के किस्से की अंतिम कड़ी.(भगत सिंह - जन्मदिन 27 सितम्बर पर विशेष)
शहीदों की चिताओं पर लगेगें हर बरस मेले,
वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशान होगा.इन्कलाब जिंदाबाद.
भगत सिंह ने मन्ने मिला दो
तन का करदे ढेर
इस कारण कुनबा सारा
सौ सौ पड़े मुसीबत
तेरी रजा में रजा
मंगलवार, 25 सितंबर 2012
शुक्रवार, 21 सितंबर 2012
किस्सा भगत सिंह (ऑडियो) हरियाणवी-भाग दो
प्रस्तुत है भगत सिंह के हरियाणवी किस्से का अगला भाग
ना मान्या धड़का
यो देश हमारा
हम तुम सारे एक वतन
भगतसिंह की चिठ्ठी
मंगलवार, 18 सितंबर 2012
किस्सा भगत सिंह (ऑडियो) -भाग एक
हरियाणा में रागिणी की समृद्ध परंपरा है. धार्मिक किस्सों के अतिरिक्त अनेक गायकों ने शहीदों,लोकनायकों और स्वतंत्रता संग्राम के किस्सों को भी लिखा-गाया है. भगत सिंह का किस्सा भी हरियाणवी जनमानस में काफी लोकप्रिय रहा है. इस माह सत्ताइस सितम्बर को शहीद भगत सिंह का जन्मदिन है. अपने श्रोताओं व पाठकों के लिए भगत सिंह का किस्सा किश्तों में प्रकाशित करेंगे. इस किस्से को गाया है मास्टर सतबीर सिंह जी ने. (सुनने के लिए नीचे दिए गए लिंक्स के प्ले बटन पर क्लिक करें, अगर आपका कनेक्शन स्लो है तो बफर होने में थोड़ा समय लग सकता है कृपया प्रतीक्षा करें)
(1)रोवन आला आपै जाणे
(2)जोड़े हाथ खड़ा
(3)भगत सिंह आजादी की हाँ
(4)कुछ तो मेरे मन में थी
शुक्रवार, 14 सितंबर 2012
अनपढ़ माणस समझे कोन्या
कैथलनामा के पाठकों-श्रोताओं के लिए आज प्रस्तुत है रागणी - अनपढ़ माणस समझे कोन्या. हमारा प्रयास रहेगा कि समय-समय पर हम आप सब के लिए हरियाणवी लोकसंगीत प्रस्तुत करते रहें. आपके सुझाव आमंत्रित हैं.
सोमवार, 10 सितंबर 2012
पंजाबी लोक गीत-किकली कलीर दी
इस दौड़ते-भागते मिक्सिंग और फ्यूजन के दौर में हमारे परंपरागत लोकगीत कहीं लुप्त होते जा रहें है. कैथलनामा का प्रयास रहेगा कि हमारी मिट्टी से जुड़े और लोकजीवन से उपजे गीतों, कविताओं, मुहावरों, पहेलियों को समय-समय पर अपने पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जाये. इस कड़ी में आज सबसे पहले प्रस्तुत है ताहिरा सैयद की आवाज में पंजाबी लोकगीत किकली कलीर दी...(सुनने के लिए नीचे दिए गए लिंक के प्ले बटन पर क्लिक करें, अगर आपका कनेक्शन स्लो है तो बफर होने में कुछ क्षण लग सकते हैं, प्रतीक्षा करें)
रविवार, 9 सितंबर 2012
वारिस शाह की हीर की महक है कैथल की मिट्टी में भी
कैथल, हीर, वारिस शाह और अमृता प्रीतम ...इनमें क्या सम्बन्ध है? इनमें क्या सांझा है? इनमें सांझा यह है कि ये पंजाब की ज़मीन से पैदा हुए हैं. तीनों ही मोहब्बत और इश्क में पगे रूहानी किस्म की शख्सियत के मालिक हैं. हीर ने इश्क के लिए अपनी जान दी , वारिस शाह ने उसके दर्द को सूफियाना ऊंचाइयों तक पहुंचाया तो अमृता प्रीतम ने हीर, इश्क और पंजाब की सांझी तहजीब और तारीख पर सियासी खंज़र के घोंपे जाने के दर्द को बिल्कुल नया फलक और आयाम दिया. उनकी नज़्म में बयान दर्द कैथल के बाशिंदों ने भी जिया. आजादी के पहले कैथल पंजाब का हिस्सा था. यह इलाका सिर्फ एक भौगोलिक इलाका नहीं था बल्कि अलग –अलग कौमों , तहजीबों, मज़हब, बोलियों, सूफियों , बेपनाह मोहब्बत, दर्द, तकलीफों और गर्मजोशी को समेटे एक अलग ही शख्सियत रहा है. ऎसी ही शख्सियत कैथल की भी रही है.
लेकिन तकसीम और सियासती फरमानों ने मंज़र बदल दिया . पंजाब के साथ कैथल भी रोया . हिंदू- मुस्लिम गंगा- जमुनी संस्कृति वाला कैथल का इलाका उजड़ने लगा . एक सरहद बना दी गई और उसके “इधर” और “उधर” आना-जाना शुरू हुआ. कैथल से भी हज़ारों लोग बाप-दादाओं की पाक ज़मीन को छोड़, माल – असबाब गाड़ियों में लादे , कांख में गठरी दबाये, अपनी औरतों को लुटते देख ,खून के आंसू पीते “उधर” गए और ऐसे हजारो लोग यहाँ आये. रिफ्यूजी कैम्प बनने लगे .कैथल शहर का हर दूसरा और तीसरा बाशिंदा “रिफ्यूजी” बन कर आया. आज भी यहाँ के गाँवों में अपने मूल बाशिंदों को याद करती न जाने कितनी हवेलियाँ खँडहर बन चुकी हैं. हजारों बाशिंदों के ख्यालों में अभी भी अपने वालिदों या अपने बचपन के घरों, गलियों , मोहल्लों , और बाज़ारों को देखने , उनकी दीवारों को एक बार छू लेने, किसी पुराने अमरुद के दरख़्त पर लटक जाने और वहाँ की हवाओं को फेफड़ों में सोख लेने की कशिश बाक़ी है. सैंतालीस में आये बच्चों के चेहरों पर झुर्रियाँ आ गयीं हैं . लेकिन तमाम तकलीफों के बावजूद उन सब ने पंजाब की जिजीविषा , हिम्मत, मोहब्बत ,तहजीब और लगन को इस शहर की हवाओं में घोल सदियों पुराने इस शहर को और भी खूबसूरत बना दिया है. उन्होंने अपनी मेहनत से उद्योग , खेती ,व्यापार से लेकर साहित्य, शिक्षा और कला तक अपनी पहचान और जगह बनाई है. यह शहर हौसले वाला शहर है. और इसे यह हौसला दिया है उजड़ कर आये लोगों ने. यह शहर उन्हें सलाम करता है. यह शहर हीर, वारिस शाह, अमृता प्रीतम और उनकी मोहब्बत को सलाम करता है. यहाँ से उजड कर वहां बसे और वहां से उजड कर यहाँ बसे लोगों के लिए प्रस्तुत है अमृता प्रीतम की यह नज़्म जो उन्होंने विभाजन के बाद लिखी थी..इस नज़्म में उन्होंने वारिस शाह को संबोधित करते हुए कहा है कि जब पंजाब में हीर नाम की एक बेटी रोई थी तो उन्होंने उसके दर्द को संगीत में ढालकर लोकगीत बना दिया...आज जब विभाजन के समय लाखो बेटियां रो-चीख रहीं हैं तो वो बुला रही है वारिस शाह को और पूछ रहीं हैं कि कहाँ है उनके गीत ...सुनिए ये नज़्म खुद अमृता प्रीतम की आवाज़ में:
(प्ले बटन पर क्लिक करें, अगर आपका कनेक्शन स्लो है तो 'बफर' होने में कुछ क्षण लग सकते हैं, कृपया प्रतीक्षा करें)
-आशु वर्मा
शुक्रवार, 7 सितंबर 2012
रेडियो पर आज की खास पेशकश
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तितरम मोड़: आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक - ग़ालिब
तितरम मोड़: आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक - ग़ालिब
गुरुवार, 6 सितंबर 2012
गजल-गुलाम अली
ये है कैथल रेडियोनामा. इस रेडियो के माध्यम से आप रोज-रोज कुछ नया सुन पायेंगे. गीत-संगीत, कविता-कहानी, कही-अनकही,गप-शप,और रूबरू भी हो सकेंगे शहर की अलग-अलग आवाजों से. आज इस फीचर में सबसे पहले सुनिए गुलाम अली को ...'हम तेरे शहर में आये हैं मुसाफिर की तरह, सिर्फ एक बार मुलाकात का मौका दे दे'
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