रविवार, 30 सितंबर 2012

कैथलनामा और संभव का भगत सिंह को सलाम


                      28 सितम्बर, यानि भगत सिंह . भगत सिंह यानि हिन्दुस्तान का सबसे अज़ीम बेटा... इस बेटे का जन्मदिन हिन्दुस्तान भर में मनाया गया और आज ही खबर मिली कि पाकिस्तान में भी जहां लाहौर में पुरानी लाहौर जेल थी, जहाँ भगत सिंह को फांसी दी गई थी, उस जगह को  “भगत सिंह चौक” का नाम देकर उनकी शहादत को सलाम किया गया. 27 सितम्बर से ही देश के गाँवों, कस्बों, शहरों, स्कूलों, और सामाजिक संगठनों के द्वारा भगत सिंह के विचारों और जज्बों को याद करते हुए पढ़े – लिखे और गाँव के धुर अनपढ़ लोगों ने भी भगत सिंह को याद किया.
   हमने भी “संभव’ और “प्रेमचंद पुस्तकालय” की ओर से कैथल के गाँव तितरम में 26  से लेकर 30 सितम्बर तक बिलकुल अलग – अलग तरह के कार्यक्रम किये.
       26 सितम्बर को “संभव” के कार्यकर्ताओं, समर्थकों और चाहने वालों ने भगत सिंह की पूरी विचार यात्रा और काम करने के तरीकों में समय के साथ आये बदलावों पर बातचीत की . हमने जानने की कोशिश की कि आखिर देश के प्रति मोहब्बत का वो कौन सा जज्बा था जिसने अट्ठारह- उन्नीस साल के एक नौजवान को चुपचाप अपने पिता को एक ख़त लिख कर अपना घर – बार छोड़ देश के लिए कुर्बान होने के लिए प्रेरित किया. “नौजवान भारत सभा” “हिन्दुस्तान रिपब्लिकन आर्मी” और  “हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी” के गठन और भगत सिंह के विचारों के क्रमशः साफ़ होते जाने, असेम्बली में बम फेंकने और फांसी के लिए जिद करने के पीछे उनके तर्कों पर हमने चर्चा की. हमने पाया की देश, समाज, राजनीति, भाषा, साम्प्रदायिकता, धर्म, साहित्य, नौजवानियत, मोहब्बत, रूमानियत और न जाने क्या - क्या....शायद ही कोई ऐसा विषय हो जिस पर भगत सिंह ने सोचा और लिखा ना हो. बातचीत में लोगो ने जोर दिया कि आज हर गाँव क्या बल्कि हर इंसान को भगत सिंह बनने की ज़रुरत है क्योंकि आज भी वे समस्याएँ, शोषण और भेद- भाव मौजूद हैं जिन्हें भगत सिंह ख़त्म करना चाहते थे. कार्यक्रम में भगत सिंह के कुछ लेख भी पढ़े गए और आंगनवाडी यूनियन लीडर संतरों ने भगत सिंह पर एक रागिनी सुनायी.
       हमें लगा कि छोटे-छोटे  भगत सिंह पैदा करने का एक तरीका यह हो सकता है कि, हम अपने आसपास के बच्चों से भगत सिंह के बारे में बातें करें. आखिर जलियाँ वाला बाग़ की मिट्टी उठाकर गोरी सरकार को उखाड़ फेंकने की कसम खाने वाला एक नन्हां भगत ही तो था.....हमने तितरम के ‘प्रेमचंद पुस्तकालय” में गाँव के बच्चों को बातचीत और देशभक्ति के गीत गाने के लिए आमंत्रित किया. हमे लगा था कि गवैया किस्म के थोड़े से बच्चे आ जायेंगे . लेकिन यहाँ तो लाइब्रेरी का हॉल खचाखच भर गया. हॉल भर गया तो कई खिडकियों पर लटक गए . कुछ ने दरवाजों में पिरामिडनुमा दर्शक – दीर्घा ही बना डाली तो कुछ मेजों पर ही चढ़ गए....बच्चों का ऐसा सुहाना कोलाहल की  मन झूम उठा . दो साल की  बच्ची से लेकर पंद्रह साल के बच्चे तक.... कुछ नौजवान अपने आप ही इस बाल- तूफ़ान को अनुशासित करने और उन्हें बैठाने में लग गए. सब गाने को तैयार....किसे गंवाएं और किसे न... खैर, सबने मिलकर भी गाया और जो ख़ास तैयारी कर के आये थे उन्हें ख़ास मौक़ा भी दिया गया. उन्हें भगत सिंह की कहानी भी सुनायी गई.
     इस कार्यक्रम के दौरान हमे लगा कि शहर की तुलना में गाँवों के बच्चे भगत सिंह के बारे में ज़्यादा जानते हैं... शायद इसमें गाँव के पुरानी परम्परा के आदर्शवादी मास्टरों का योगदान है.
       हमें लगा कि निश्छल और उत्साही बच्चों में ही देश के लिए मोहब्बत का जज्बा भरना शुरू कर देना चाहिए. उन्हें हम अपने हिसाब से ढाल सकते हैं. एक बेहतर इंसान बना सकते हैं. खेल, गीत, फिल्म, कहानियों, नाटक या फिर बाल - कार्यशालाओं के ज़रिये बिना दबाव डाले उनमें वैज्ञानिक समझ और विचार विकसित किये जा सकते हैं.
         इसी क्रम में हमने तीसरा कार्यक्रम 30 सितम्बर को तितरम की दलित बस्ती में किया. कितने शर्म की बात है कि इंसान और गाँव “अगड़े” और “पिछड़े” में बंटे हुए हैं. हर गाँव में एक “दक्खिन टोला” होता है जैसे अंग्रेजों के समय “व्हाइट टाउन” और “ब्लैक टाउन” हुआ करते थे. ब्लैक टाउन  तो गंदगी भरे, भीडभाड़ वाले और उपेक्षित होते थे...दलित बस्ती, यानि दक्खिन टोले भी ऐसे ही होते हैं. यहाँ उपेक्षित, सदियों से दबाये गए, भेदभाव के शिकार, कम पढ़े लिखे बेरोजगार किस्म के लोग रहते हैं जो छोटा मोटा काम कर लेते हैं. लेकिन हमने पाया कि ये अपनी बेटियों से मोहब्बत करतें हैं. लेकिन गरीबी ,पिछड़ेपन और अशिक्षा के कारण उन्हें पढ़ा नहीं पाते. तितरम और ‘संभव” के हमारे कार्यक्रमों में भी उनकी भागीदारी सामाजिक ताने-बाने के कारण सीमित ही रही है. इसी दूरी को पाटने के लिए हमने 30 सितम्बर को इस बस्ती में एक बैठक की जिसमें  ऎसी लड़कियों को पढ़ाने की योजना बनाई जिन्होंने गरीबी या किन्हीं और वजहों से अपनी पढाई छोड़ दी है. हमारी सभा में बीच में ही पढाई छोड़ चुके forced  बेरोजगार भी अपनी पहलकदमी से आ गए.
        इस कार्यक्रम के दौरान हमें लगा की हर तरफ एक बेचैनी , एक खालीपन , एक कसमसाहट और गुस्सा है. बस ज़रुरत है उसे एक सही दिशा और  एक सही रास्ता देने की . कालजयी नायकों की प्रेरणा से नए नायक – नायिकाएं पैदा करने की. हमारा यही प्रयास रहा है. यही है हमारा तरीका भगत सिंह के प्रति हमारी मोहब्बत  दीवानगी दिखाने और उन्हें सलाम करने का....
 (कार्यक्रम का एलबम हम जल्दी ही पोस्ट करेंगे )

बुधवार, 26 सितंबर 2012

किस्सा भगत सिंह-(ऑडियो)-हरियाणवी-भाग चार (अंतिम)

प्रस्तुत है भगत सिंह के किस्से की अंतिम कड़ी.(भगत सिंह - जन्मदिन 27 सितम्बर पर विशेष) शहीदों की चिताओं पर लगेगें हर बरस मेले, वतन पर मिटने वालों का यही बाकी निशान होगा.इन्कलाब जिंदाबाद. भगत सिंह ने मन्ने मिला दो तन का करदे ढेर इस कारण कुनबा सारा सौ सौ पड़े मुसीबत तेरी रजा में रजा

मंगलवार, 25 सितंबर 2012

किस्सा भगत सिंह (ऑडियो)- हरियाणवी -भाग तीन

पूत तेरे ने मारण भगत सिंह की चिट्ठी

टेंडर डेंगू का......



     काफी समय से अखबारों में कैथल जिले में फैले डेंगू , जापानी बुखार और मलेरिया से मरने वालों की ख़बरें आ रहीं हैं. जिले में संदिग्ध बुखार से अब तक दो लोगों की मौत हो  चुकी है. जब कैथल जिले में जपानी बुखार की टेस्टिंग सुविधा है ही नही तो कैसे कहा जा सकता है कि जिले में और भी जो मौतें  हुई हैं वह जापानी बुखार से नहीं हुई हैं... आखिर कितने लोग शहर आकर अपना इलाज करा पाते  हैं ? कितने आश्चर्य की बात है की मच्छरों से निजात पाने के लिए फॉगिंग में इस्तेमाल होने वाली दवा तक का इंतजाम नही हो पाया है...क्या हम उम्मीद कर सकते हैं कि किसी तरह अपने परिवार का गुजर बसर करने वाले लोग महंगे होते इस समय में  रोज हिट जैसी मच्छर मार दवाइयों को खरीद पाते हैं ? पिछले साल इन बीमारियों  से लगभग एक दर्जन मौतें हुई थीं. यह तो सिर्फ सरकारी आंकड़ा है.... सच पता नहीं क्या हो...एक साल में जनता ने अपने खून-पसीने की गाढ़ी कमाई का पता नहीं कितना हिस्सा सरकार को दिया है....पिछले एक साल में कुछ लोगों के खातों में जमा राशि में शून्य की संख्या इतनी बढ़ गयी है की उन्हें गिनने में आम आदमी का दिमाग गड्डमड्ड होने लगता है. देश में धन की कमी नहीं है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में ये मामूली सुविधाएँ भी लोगों को नहीं मिल पा रहीं हैं. बेरोजगारों की फ़ौज के बावजूद  आदमी की जान से जुड़े इतने महत्वपूर्ण महकमे में कर्मचारियों की संख्या  इतनी कम है की योजनाओं को ठीक से अंजाम भी नहीं दिया जा पाता. अधिकारियों का कहना है कि इस साल डेंगू और जापानी बुखार के मच्छरों को मारने के लिए फॉगिंग में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का टेंडर ही देर से हुआ...क्या ही अच्छा होता की ये अधिकारी टेंडर में विलम्ब की सूचना यमदूत को भी भेज देते ताकि वे असमय मौत देने के पाप के भागीदार तो नहीं बनते.
          डेंगू और जापानी बुखार पिछले सात - आठ से सुनी जाने वाली बीमारियाँ हैं...ये नए ज़माने की , बदलते आर्थिक - सामाजिक परिवेश की , नए किस्म के औद्योगिक कचरे के कारण पनपने वाली और सरकारों के बेगाने होते जाने वाले वक़्त की बीमारियाँ हैं.... इनसे सामूहिक और सार्वजनिक तौर पर ही निबटा जा सकता है. संवेदनशील सरकारें ही इनसे निपट सकती हैं.    

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

किस्सा भगत सिंह (ऑडियो) हरियाणवी-भाग दो

प्रस्तुत है भगत सिंह के हरियाणवी किस्से का अगला भाग ना मान्या धड़का यो देश हमारा हम तुम सारे एक वतन भगतसिंह की चिठ्ठी

पंजाब का गांव 1925 में - छोटी सी फिल्म

1925 में बनी यह एक मूक और ब्लैक एंड व्हाइट फिल्म है. हालाँकि इसे ब्रिटिश इंस्ट्रक्शनल सीरीज के तहत अंग्रेज फिल्मकारों ने अपने दर्शकों को दिखाने के लिए बनाया था. इस फिल्म में उस दौर के पंजाब की एक झलक है. रहट, कोल्हू और हल को देखना तो आज की पीढ़ी के लिए एक अजूबे की तरह है. 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

बाबा तोतापुरी : कैथल का अद्वैत दार्शनिक और रामकृष्ण परमहंस का गुरु,

 
      

हरियाणा और  कैथल  शिक्षा, ज्ञान और दर्शन का विशेष केन्द्र रहें हैं. लोगों को यह यकीन नहीं होगा कि कैथल के बाबा लदाना गाँव में उन्नीसवीं  सदी में एक ऐसा दार्शनिक पैदा हुआ जिसके बारे में  बीसवीं सदी में  विश्व  के महानतम  दार्शिनिकों  में से एक , रोमा रोलां  ने बड़े सम्मान के साथ अपने विचार रखे . यह दार्शनिक थे बाबा लदाना के तोतपुरी . वे अद्वैत  दर्शन के महानिर्वाणी अखाड़े के  नागा पंथ से ताल्लुक रखते थे. उन्होंने लदाना के ही बाबा राजपुरी मठ से शिक्षा पाई थी. 1858 में वे डेरा के मुखिया बने .  भौतिक जगत और माया  को नकार कर वे अंतिम सत्य  की खोज में लगे थे.  अपने प्रश्नों के उत्तर तलाशते उन्होंने वस्त्र भी त्याग दिए जिससे जन के बीच वे नंगता बाबा के नाम से जाने गए. 1861 में सत्य की खोज में  यायावरी करते वे मठ से  निकल पड़े . शास्त्रार्थ करते वे कलकत्ता पहुंचे जहां 1864 में  उनकी  मुलाक़ात सत्य को तलाशते एक और  बेचैन संत  से हुई . वे थे  स्वामी विवेकानंद  के गुरु राम कृष्ण परमहंस .  रोमा रोलां ने कहा है कि  इस मुलाकात ने राम कृष्ण की दार्शनिक सोच को आकार देने में और  जीवन की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की . बाबा तोतापुरी ने  काली की भक्ति में  आसक्त राम कृष्ण को अद्वैत दर्शन के अपने प्रश्नों से झिंझोड़ कर रख दिया. साकार ब्रह्म और काली की भक्ति से वे ध्यान नही हटा पा रहे थे . बाबा तोतापुरी ने परमहंस को द्वैत का रास्ता छोड़ अद्वैत का रास्ता अपनाने के लिए प्रेरित किया. आत्मसाधना और चिंतन के बाद  उन्होंने अद्वैत दर्शन को अपनाया . वे तोतापुरी के शिष्य बन गए. आध्यात्मिक इतिहास में गुरु और शिष्य की यह मुलाक़ात  अनोखी मानी जाती है क्योंकि जहां शिष्य ने गुरु से अद्वैत दर्शन सीखा तो  गुरु ने अपने  शिष्य से अटूट भक्ति सीखी. दोनों ने परस्पर एक दूसरे से सीखा तो एक दूसरे को दिया भी.
    इस घटना से यह तो साबित होता ही है कि कैथल शहर और इसके आसपास का इलाका एक समय में ज्ञान  और दर्शन के क्षेत्र में बेहद उन्नत था. और यह सब तभी संभव हो पाया क्योंकि कैथल सदियों से  शिक्षा , ज्ञान , दर्शन और संस्कृति का केन्द्र रहा है. यही हमारी धरोहर और विरासत है. हमें इसे जानना है और समझना है  और इसे  संजो कर रखना है.